उतरौला बलरामपुर -तहसील क्षेत्र में अल्ट्रा साउंड की जांच व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि नगर के दो अल्ट्रा साउंड केन्द्र पर एक ही रेडियोलॉजिस्ट के नाम से संचालित हो रहे हैं, और दोनों स्थानों पर एक ही समय में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट तैयार किए जाने की स्थिति सामने आ रही है। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह न केवल मरीजों के साथ होने वाली जांच व्यवस्था की पार दर्शिता पर सवाल खड़ा करेगा, बल्कि सम्बन्धित विभागीय नियमों के अनुपालन में भी जांच जरूरी होगी। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानका री के अनुसार नगर क्षेत्र की परिधि में पांच अल्ट्रासाउंड केन्द्रों को लाइसेंस प्राप्त होने की बात कही जा रही है। इनमें एस डी हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेन्टर, बलराम पुर पैथालॉजी,सविता पैथालॉजी, जनता डायग्नोस्टिक सेन्टर और इंडियन पैथालॉ जी के नाम सामने आते हैं। मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जनता डायग्नो स्टिक सेन्टर और बल रामपुर पैथालॉजी से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। आरोप यह है कि दोनों केन्द्रों के पंजीकरण में एक ही रेडियोलॉजिस्ट का नाम दर्ज है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से सवाल यह उठता है कि सम्बन्धित विशेष ज्ञ की दोनों केन्द्रों पर वास्तविक उपस्थिति किस प्रकार सुनिश्चित की जाती है। एक विशेषज्ञ, दोनों जगह की मौजूदगी कैसे होती है अल्ट्रासाउंड जैसी जांच में विशेषज्ञ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यदि दो अलग- अलग केन्द्रों पर एक ही विशेषज्ञ की सेवाएं दर्ज हैं और दोनोंकेन्द्रों पर एक ही समय के आस पास बड़ीसंख्या में जांचें हो रही हैं, तो सम्बन्धित रिकॉर्ड की जांच जरूरी हो जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दोनों केन्द्रों पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में अल्ट्रा साउंड होने की चर्चा है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को यह जांच ना चाहिए कि सम्ब न्धित रेडियोलॉजिस्ट की ड्यूटी किस केन्द्र पर कितने घण्टे रहती है, और दोनों केन्द्रों पर जांच की वास्तवि क टाइमिंग क्या है।यही वह सवाल है, जिस पर स्थानीय स्तर पर चर्चाएं तेज हैं।क्या एक हीरेडियोलॉजिस्ट एक ही समय में दो अलग-अलग स्थानों पर मरीजों की जांच कर सकता है। यदि नहीं, तो फिर दोनों केन्द्रों की रिपोर्टों की वास्तविक जांच-समय और विशेषज्ञ की उप स्थिति का रिकॉर्ड क्या बताता है।रिपोर्ट में समय का उल्लेख नहीं होने का आरोप
मामले में एक और गम्भीर आरोप सामने आया है। कुछ लोगों का कहना है कि सम्बन्धित केन्द्रों से जारी होने वालीअल्ट्रा साउंड रिपोर्ट में जांच की तारीख और समय का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया जाता। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी भी बाकी है, लेकिन यदि रिपोर्ट में जांच की तारीख और समय दर्ज नहीं किया जा रहा है, तो मरीजों और दूसरे चिकित्स कों के लिए रिपोर्ट की प्रक्रिया को सत्यापित करना मुश्किल हो सकता है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि रिपोर्ट में जांच का समय स्पष्ट दर्ज हो तो सम्बन्धित रेडियोलॉजिस्ट की उपस्थिति और दोनों केन्द्रों की गतिविधियों का मिलान आसानी से किया जा सकता है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग के द्वारा रिपो र्टों, मरीज रजिस्टर, अल्ट्रासाउंड मशीन के रिकॉर्ड और विशेषज्ञ की ड्यूटी से सम्बन्धि त दस्तावेजों की जांच कराए जाने की मांग की जा रही है। जांच शुल्क में भी बड़ा अन्तर मामले का दूसरा पहलू अल्ट्रा साउंड जांच के शुल्क से जुड़ा है। आरोप यह है कि सम्बन्धित दोनों केन्द्रों पर अल्ट्रा साउंड की फीस 700 रुपये से बढ़ाकर लग भग 1,200 रुपयेतक कर दी गई है, जबकि नगर के अन्य केन्द्रों पर लगभग 700 रुपये शुल्क लिए जाने की बात कही जा रही है। ऐसे में मरीजों के बीच सवाल उठना स्वाभाविक है कि समान प्रकार कीजांच के लिए अलग-अलग केन्द्रों पर शुल्क में इत ना अन्तर क्यों है।स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वह सभी लाइसेंस प्राप्त केन्द्रों पर निर्धारित जांच शुल्क, प्रदर्शित रेट लिस्ट और मरीजों से लिए जा रहेवास्तविक शुल्क की जांच करे। यदि कहीं निर्धारित दर से अधिक वसूली हो रही है, तो उसके सम्बन्ध में भी नियमा नुसार कार्यवाही की जानी चाहिए। बाहर के डॉक्टरों द्वारारिपोर्ट पर सवाल यह उठता है कि कुछ मरीजों और स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि बाहर के चिकित्स कों द्वारा स्थानीय स्तर पर कराई गई अल्ट्रा साउंड रिपोर्ट को स्वीकार न करते हुए मरीजों को दोबारा जांच कराने कीसलाह दी जाती है।यदि ऐसा लगातार हो रहा है तो यह गम्भीर विषय है। इससे मरीजों को दोह री जांच का खर्च उठा ना पड़ सकता है,और उनकी परेशानी भी बढ़ सकती हैहालांकि इस दावे की भी विभा गीय जांच से ही पुष्टि हो सकती है। रिकॉर्ड की जांच से खुल सकता है पूरा मामला
पूरे प्रकरण में सबसे महत्व पूर्ण भूमिका दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की हो सकती है। स्वास्थ्य विभाग यदि निष्पक्ष तरीके सेजांच करे, तो सम्बन्धित केन्द्रों के पंजीकरण दस्तावेज, रेडियोलॉ जिस्ट की उपलब्धता, मरीज रजिस्टर,अल्ट्रा साउंड रिपोर्ट, मशीन के लॉग, जांच की तारीख एवं समय तथा शुल्क से सम्बन्धित रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है। इन रिकॉर्डों के मिलान से यह पता लगाया जा सकता है कि आरोपों में कितनी सच्चाई है, और कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया जा रहा। अधिकारियों की खामोशी पर भी उठ रहे सवाल, सबसेबड़ा सवाल यह है कि यदि स्थानीय स्तर पर इस तरह की चर्चाएं और शिकायतें सामने आ रही हैं, तो स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था क्या कर रही है। क्या सम्बन्धित अधिकारियों ने कभी दोनों केन्द्रों की अचा नक जांच की।क्या रेडियोलॉजिस्ट की वास्तविक उपस्थिति का सत्यापन किया गया। क्या मशीनों के रिकॉर्ड और मरीज रजिस्टर का मिलान किया गया।क्या दोनों केन्द्रों के द्वारा लिए जा रहे शुल्क कीजांच की गई।और यदि रिपोर्ट में समय दर्ज नहीं है तो इसका कारण क्या है। इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही साम ने आ सकता है। तथा मरीजों के हित में ही हो निष्पक्ष जांच, अल्ट्रासाउंड जांच केवल एक सामान्य जांच नहीं, बल्कि कई मामलों में मरीज के उपचार और बीमारी की पहचान का महत्व पूर्ण आधार होती है। इसलिए इसकी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रि या में किसी भी प्रकार की अनियमितता की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।स्थानीय लोगों की मांग है किस्वास्थ्य विभाग पूरे मामले को गम्भीरता से लेते हुए दोनों केन्द्रों के रिकॉर्ड की जांच कराए और संबंधित रेडियोलॉ जिस्ट की वास्तविक उपस्थिति का सत्या पन करे। साथ हीसाथ जांच शुल्क, रिपोर्ट में तारीख एवं समय के उल्लेख और मशीनों के रिकॉर्ड की भीजांच हो। यदि जांच मे आरो प सही पाए जाते हैं तो सम्बन्धित जिम्मेदा रों के विरुद्ध नियमानु सार कार्यवाही की जानी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो स्वा स्थ्य विभाग को सार्व जनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि मरीजों के बीच बनी शंकाओं का समा धान हो सके। अब निगाहें स्वास्थ्यविभाग की जांच पर हैंसवाल सिर्फ दो अल्ट्रासाउंड केन्द्रों का नहीं, बल्कि मरीजों के भरोसे और पूरी जांच व्यवस्था की पारदर्शिता का है।
हिन्दी संवाद न्यूज से
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उतरौला बलरामपुर।
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