जौनपुर। रचना - श्रंगार करोगे कब तुम प्रियतम...

देखा न कभी तुमको प्रियतम
बचपन के मेले में.....जीवन के कुछ सपने देखे
जब भी रही अकेले में....
गुड्डे-गुड़ियों संग मैं खेला करते
तुम करते थे माटी से प्यार....विधना ने जो मेल कराया
शुरू हुआ अपना अभिसार....
नैनों से नैनों का व्यवहार हुआ
अधरों से अधरों का प्यार मिला..मैं नई नवेली दुल्हन थी
नित सजती और सँवरती थी....
पर तुमको इसका भान कहाँ था,
खुद का कोई अभिमान कहाँ था..शायद कुल की मर्यादा थी या
मन पर भारी था लोकाचार....
सदा बने रहे तुम प्रियतम
परिजन के दिल के हार....मैं मनुहारी कर पूछा करती
तब भी हरदम
आखिर श्रृंगार करोगे
कब तुम प्रियतम......?
अपनों को ना जान सके
ना अपनों को पहचाना....प्रियतम होकर भी
प्रिय से अकसर किए बहाना...
पीड़ा मेरी ना समझी तुमने
ना देखी मेरी तपती काया....जाने कैसा मन था तेरा
ठग न सकी तुझको....!
मुझ नारी की ठगनी माया.....पीड़ा तुमने ना देखी खुद की
ना देखी कांतिहीन सी काया...
किया वही तुमने प्रियतम
जो तुझको-तेरे मन को भाया...प्रश्न वही मेरा फिर था हमदम
आखिर श्रृंगार करोगे
कब तुम प्रियतम.....?
जरा गौर से अब देखो मुझको
उतर गया है यौवन का भार.....लगते नहीं है अच्छे मुझको
अब चंपा-बेला और कचनार झेल लिया सब सुख-दुख
संग तेरे प्रियतम.....!
पार किया सब मझधार.....
पर देख सकी ना तुझको
मन भर साजन....! जब भी हुई कभी आँखे चार...
कुछ तो मजबूरी थी
कुछ था लोकाचार....सोच सको तो अब सोचो प्रियतम
कहीं भूल न जाऊँ मैं यम-संयम
सपने में ही आकर
धीरे से ही कह जाओ,
उत्तर दे जाओ.....आखिर श्रृंगार करोगे
कब तुम प्रियतम.....?
आखिर श्रृंगार करोगे
कब तुम प्रियतम....?

रचनाकार....
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस अधीक्षक/क्षेत्राधिकारी नगर,जनपद-जौनपुर

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