फर्जीवाड़ा का खुलासा करने पर मैग्सेसे पुरस्कार की जगह मिलती है धमकियां, यह नया भारत है!

क्या 5 करोड़ के फर्जी मुकदमे से दब जाएगी पत्रकारों की आवाज !


नई दिल्ली: आप यदि पत्रकारिता के माध्यम से देश एवं राष्ट्रहित में कालेकरनामो का खुलासा करते हैं तो आप को इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि बदले में आप के न्यूज चैनल (यूट्यूब- मेटा) पर प्रतिबंध लगाने की धमकी एवं करोड़ों के मानहानि का मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। आप यदि ऐसा सोच रहे हैं कि फर्जीवाड़ा का खुलासा करने पर मैग्सेसे पुरस्कार के लिए आपको नामित किया जाएगा तो आप गलत सोच रहे हैं, यह नए दौर का भारत है जहां सच्चाई दिखाने पर आपका गला घोंट दिया जाएगा।भारत में वर्तमान समय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की स्थिति और खोजी पत्रकारिता (investigative journalism) से जुड़े गंभीर मुद्दों को लेकर अब उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भी खुलकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों की आवाज़ को दबाने के लिए बड़े वित्तीय संसाधनों के इस्तेमाल का एक नया और गंभीर मामला सामने आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर किए गए एक मानहानि मुकदमे  के दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ है कि कैसे हेल्थ-टेक और वेलनेस सेक्टर से जुड़ी एक कंपनी PSTGems Private Limited (Positive Gems) ने अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को कुचलने के लिए 5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम मानहानि का दावा ठोक दिया है। 

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ समय पूर्व अधिवक्ता मोहित द्वारा ड्रग डिपार्टमेंट में यह शिकायत की गई कि उक्त कंपनी द्वारा एक एलोपैथिक टैबलेट ('Tadalafil', जो कि एक शेड्युल 'H' ड्रग है) को आयुर्वेदिक दवा के रूप में बेचा जा रहा है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्र्त अखबार व् डिजिटल न्यूज़ चैनल  "Sach Ki Raftar" और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर खबरें चलाई गईं और जनता के स्वास्थ्य से जुड़े कई गंभीर सवाल उठाए गए। 

रिपोर्ट्स और अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, सच्चाई सामने आने के बाद कंपनी ने पहले तो यूट्यूब पर 14 से अधिक कॉपीराइट स्ट्राइक्स डलवाकर चैनल को बंद करवाने की कोशिश की, ताकि सच सबके सामने न आ सके। परंतु, जब यूट्यूब ने सच्चाई का साथ देते हुए सभी कॉपीराइट्स हटा दिए और वीडियो को पुनः लाइव कर दिया, तो कंपनी ने कथित तौर पर बदले की भावना से दिल्ली उच्च न्यायालय में 5 करोड़ रुपये के हर्जाने का मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। 

आरोप यह है कि इस तरह के बड़े मुकदमों का इस्तेमाल सिर्फ कानूनी राहत पाने के लिए नहीं, बल्कि वित्तीय ताकत के बल पर छोटे पत्रकारों और सवाल उठाने वालों को डराने और उनकी आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश करने के हथियार के रूप में किया जा रहा है। 

एक तरफ जहां कंपनी का टर्नओवर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़कर करोड़ों में पहुंच चुका है, वहीं दूसरी और उत्पादों की गुणवत्ता, एलोपैथिक दवाओं को आयुर्वेद के नाम पर बेचने के दावों और विज्ञापनों को लेकर सवाल उठाने वालों पर कानूनी शिकंजा कसा जा रहा है। 

पत्रकारिता जगत और कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि इस प्रकार बड़े पूंजीपति वर्ग द्वारा कानूनी तंत्र का इस्तेमाल करके जनता के मुद्दों को उठाने वालों का मुंह बंद कराया जाता रहा, तो यह स्वतंत्र प्रेस और आम जनता के मौलिक अधिकारों के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएगा। फिलहाल यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय के विचाराधीन है, जहां न्याय की आस में पत्रकार और मीडियाकर्मी अपनी लड़ाई मजबूती से लड़ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या पैसे के जोर पर सच की रफ्तार को रोका जा सकेगा, या फिर न्याय के तराजू में सच्चाई की जीत होगी?


'सच की रफ्तार' पर 5 करोड़ का मानहानि केस: भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ ने जताया कड़ा रोष

खोजी पत्रकारिता पर प्रतिबंध, लोकतंत्र की हत्या।

निष्पक्ष एवं खोजी पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों पर प्रतिबंध एवं मानहानि का नोटिस जारी करना लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है।चौथे स्तंभ पर लगातार बढ़ते हमलों के बीच एक नया मामला सामने आया है। 'सच की रफ्तार' समाचार पत्र और उसके मुख्य संपादक व् भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष धर्मवीर जारवाल के खिलाफ PST Gems नामक कंपनी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में 5 करोड़ रुपये का मानहानि का केस दर्ज कराया गया है। इस घटना के सामने आते ही देश के सबसे बड़े पत्रकार संगठन भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ (BSPS) ने इसे कलम को दबाने की साजिश करार देते हुए अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और जालसाजों को जालसाजी से बाज़ आने की हिदायत दी है।

पत्रकारों की आवाज दबाना लोकतंत्र की हत्या: अशोक पांडे

भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ (BSPS) के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक पांडे ने इस 5 करोड़ रुपये के दावे पर गहरा रोष व्यक्त करते हुए कहा:"सीमित संसाधनों के बावजूद एक पत्रकार आम जनमानस की आवाज को बुलंद करता है। खुद अभावों में रहकर जनता के जीवन को बेहतर बनाने के लिए सरकारों और भ्रष्ट तंत्र से सवाल पूछता है। अगर ऐसे निडर पत्रकारों को कोर्ट-कचहरी और मुकदमों के जरिए प्रताड़ित किया जाएगा, तो यह बेहद निंदनीय है। यह सीधे तौर पर लोकतंत्र की हत्या का प्रयास है, जिसे संगठन किसी भी कीमत पर सहन नहीं करेगा।"

राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने बोला सीधा हमला

इस मुद्दे पर BSPS के अन्य शीर्ष नेतृत्व ने भी कड़े शब्दों में अपनी बात रखी: गिरिधर शर्मा (राष्ट्रीय संगठन सचिव): "यह बेहद निंदनीय और शर्मनाक है कि एक पत्रकार को उसका कर्तव्य निभाने से रोका जा रहा है। कानूनी दांव-पेचों के जरिए सच की आवाज को चुप कराने की यह कोशिश पूरी तरह विफल होगी।"

शैलेश्वर पांडा (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष): "दुनिया के अन्य देशों में जब पत्रकार आवाज उठाते हैं तो उनका सम्मान किया जाता है, लेकिन भारत में जब पत्रकार सच दिखाते हैं तो उन्हें समन (Notice) भेजे जाते हैं। क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पूरी तरह चकनाचूर हो चुका है?"

शहनवाज हसन (संस्थापक, BSPS): "देश में लगातार पत्रकारों का शोषण बढ़ता जा रहा है, जिसे लेकर सभी पत्रकार संगठन बेहद चिंतित हैं। क्या पत्रकारों को दबाने के लिए एक झूठा कोर्ट केस बना देना ही काफी है ? क्या ऐसे मुकदमे पत्रकारों की बुलंद आवाज को दबा सकते हैं ? बिल्कुल नहीं। जब तक देश में संविधान और लोकतंत्र बहाल है, तब तक किसी भी पत्रकार के साथ ऐसा अन्याय भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ नहीं होने देगा।"

BSPS लेगा सभी झूठे मुकदमों का संज्ञान

भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ ने साफ कर दिया है कि 'सच की रफ्तार' और उसके दिल्ली अध्यक्ष धर्मवीर जरवाल पर दर्ज किए गए इस मानहानि के केस को एक मिसाल बनाकर कानूनी और सामाजिक स्तर पर पूरी मजबूती से लड़ा जाएगा। संगठन अब उन सभी मामलों का संज्ञान ले रहा है, जहां पत्रकारों पर सच लिखने के बदले दबाव बनाने के लिए ऐसे मनगढ़ंत और झूठे मुकदमे थोपे जा रहे हैं।पत्रकार संघ ने चेतावनी दी है कि यदि पत्रकारों की स्वतंत्रता पर इस प्रकार के प्रहार बंद नहीं हुए, तो देशव्यापी स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

Post a Comment

If you have any doubts, please let me know

और नया पुराने