भाकृअनुप–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान, देहरादून में हिमालय दिवस पर “उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण: वैज्ञानिक दृष्टिकोण” विषय पर कार्यशाला का दिनांक सितंबर 09, 2026 को आयोजन, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने हिमालय संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों का किया आह्वान

हिमालय दिवस के अवसर पर भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR-IISWC), देहरादून में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण : वैज्ञानिक दृष्टिकोणविषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ATIC, प्रेमनगर से आए विधायर्थीयों तथा ICAR-IISWC के वैज्ञानिकों, तकनीकी एवं अन्य कर्मचारियों सहित लगभग 140 प्रतिभागियों ने सक्रिय सहभागिता की एवं कार्यक्रम की एंकरिंग डॉ. विभा सिंगल, प्रधान वैज्ञानिक द्वारा की गई

कार्यक्रम का स्वागत संबोधन डॉ. जे.एम.एस. तोमर, विभागाध्यक्ष, पादप विज्ञान द्वारा किया गया। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों की पारिस्थितिक संवेदनशीलता पर प्रकाश डालते हुए जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, प्राकृतिक आपदाओं, मृदा क्षरण तथा पर्वतीय कृषि पर पड़ रहे प्रभावों के प्रति चिंता व्यक्त की और इनके समाधान के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया ।

इस अवसर पर संस्थान के कार्यवाहक निदेशक डॉ. चरण सिंह ने हिमालय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिमालय देश की प्रमुख नदियों एवं जल संसाधनों का महत्वपूर्ण आधार है। हिमालयी क्षेत्रों में होने वाले पर्यावरणीय बदलावों का सीधा प्रभाव मृदा, जल, कृषि एवं पारिस्थितिकी पर पड़ता है। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा मृदा एवं जल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रभावी तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री कल्याण सिंह रावत जी ने अपने संबोधन में हिमालय के व्यापक पारिस्थितिक, जलवैज्ञानिक, जैवविविधता एवं सामाजिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने हिमनदों में कम होती बर्फबारी तथा ग्लेशियर झीलों के बढ़ते जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हिमालयी हिमनदों एवं जल स्रोतों का संबंध प्रमुख नदियों से है और ये नदियां पीने के पानी, कृषि तथा मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

पद्मश्री रावत ने नेपाल क्षेत्र में हिमालयी जल एवं ग्लेशियर झीलों से जुड़े जोखिमों तथा केदारनाथ त्रासदी का उल्लेख करते हुए हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन एवं प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सतर्कता और वैज्ञानिक निगरानी की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिमालय की संवेदनशील भौगोलिक परिस्थितियों में पूर्व चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक अध्ययन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होने बताया कि उत्तराखंड के बुग्याल के संरक्षण के महत्व को भी रेखांकित किया। ये उच्च हिमालयी क्षेत्र जैवविविधता के महत्वपूर्ण केंद्र होने के साथ-साथ अनेको औषधीय एवं उपयोगी वनस्पतियों के प्राकृतिक आवास हैं। उन्होंने इन प्राकृतिक स्थलों के बढ़ते क्षरण, अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों तथा बदलती जलवायु के कारण उत्पन्न हो रहे दबावों के प्रति चिंता व्यक्त की। उन्होंने बुग्यालो एवं औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण, पुनर्स्थापन और सतत उपयोग के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा स्थानीय समुदायों की सहभागिता को आवश्यक बताया।

डॉ0 राजेश कौशल प्रधान वैज्ञानिक ने बांस एवं बांस की नर्सरी की उत्तराखंड मे उपयोगिता के महत्व पर प्रकाश डाला। डॉ. अनुपम बड़, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं श्री मुदित मिश्रा, वरिष्ठ तकनीकी सहायक ने आधुनिक तकनीकों के उपयोग को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से ड्रोन का व्यावहारिक प्रदर्शन किया, जिसमें कृषि एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा मृदा एवं जल संरक्षण में ड्रोन तकनीक की उपयोगिता को प्रदर्शित किया गया।

कार्यक्रम के सफल आयोजन एवं समन्वय में श्री राकेश कुमार, मुख्य तकनीकी अधिकारी का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा। कार्यक्रम के अंत में डॉ. जे. जयप्रकाश, प्रधान वैज्ञानिक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, कार्यवाहक निदेशक, वैज्ञानिकों, अधिकारियों, कर्मचारियों तथा ATIC, प्रेमनगर से आए विधायर्थीयों का सक्रिय सहभागिता एवं सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।

हिमालय दिवस पर आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य हिमालय के महत्व, जलवायु परिवर्तन एवं प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते प्रभावों, जैवविविधता एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा मृदा एवं जल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करना रहा।


  

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