भाषा नहीं, राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है हिंदी - मंजूश्री लखनऊ की विचार गोष्ठी में उभरा स्वर

लखनऊ: 18 सितम्बर, 2026



मंजूश्री लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश सूचना एवं जन संपर्क विभाग, उत्तर प्रदेश के सहयोग से ष्हिंदी दिवस की वर्तमान में प्रासंगिकताष् विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन सूचना एवं जन संपर्क विभाग के सभागार में किया गया। यह कार्यक्रम दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक चला, जिसमें साहित्य, पत्रकारिता एवं समाज से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।

गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री संजीव जायसवाल श्संजयश् ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश साहित्यिक प्रतिष्ठान के प्रभारी संपादक श्री दिनेश कुमार गुप्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन एवं संयोजन श्री अजय कुमार मिश्र अजयश्री ने बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से किया।

’भाषाई एकता और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न’

कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब एक तमिल भाषी और एक पंजाबी भाषी व्यक्ति हिंदी में संवाद करते हैं, तो यह भाषाई एकता वस्तुतः राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का कार्य करती है। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी दिवस प्रतिवर्ष इस एकता के महत्व की याद दिलाने का अवसर बनकर आता है, और यह केवल एक औपचारिक तिथि नहीं बल्कि भाषाई अस्मिता, राष्ट्रीय एकता एवं सांस्कृतिक गौरव के उत्सव के रूप में मनाया जाना चाहिए।

गोष्ठी में इस ऐतिहासिक तथ्य का भी उल्लेख हुआ कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था, जिसके बाद 1953 से प्रतिवर्ष इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि हिंदी दिवस और 10 जनवरी को मनाया जाने वाला विश्व हिंदी दिवस, दोनों भिन्न-भिन्न उद्देश्यों से जुड़े आयोजन हैं।

’सांस्कृतिक धरोहर की वाहक है हिंदी’

चर्चा के दौरान इस विचार को भी रेखांकित किया गया कि भाषा के साथ संस्कृति भी चलती है। हमारी लोककथाएँ, भजन, दोहे, मुहावरे और जीवन-मूल्य हिंदी में ही सुरक्षित हैं। कबीर के दोहे, तुलसीदास की रामचरितमानस, रहीम के नीति वचन तथा प्रेमचंद के यथार्थवादी उपन्यास कृ ये सभी हमारी सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक हैं, जिन्हें अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प हिंदी दिवस के माध्यम से दोहराया जाना चाहिए।

औपनिवेशिक मानसिकता पर चोट

वक्ताओं ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता के कारण आज भी कई लोग हिंदी बोलने में हीनता महसूस करते हैं, जबकि अंग्रेजी बोलने को श्रेष्ठता का प्रतीक मान लिया गया है। उन्होंने जापान, जर्मनी, फ्रांस और चीन जैसे विकसित देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन देशों ने अपनी ही भाषा में प्रगति की है, और भारत को भी अपनी भाषा पर गर्व करना सीखना होगा।

मातृभाषा में शिक्षा और लोकतंत्र की भाषा

गोष्ठी में इस बिंदु पर भी विचार हुआ कि कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभाषा में ही सबसे अच्छी तरह सीख और समझ सकता है, और नई शिक्षा नीति 2020 में भी मातृभाषा में शिक्षा पर बल दिया गया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि लोकतंत्र में सरकार और जनता के बीच संवाद उसी भाषा में होना चाहिए जिसे जनता समझती है, अन्यथा आम आदमी स्वयं को व्यवस्था से कटा हुआ महसूस करेगा। हिंदी को राजभाषा बनाने का मूल उद्देश्य यही था कि शासन जनता के करीब आए।

रोजगार और डिजिटल युग में हिंदी की भूमिका

वक्ताओं ने इस बात को भी रेखांकित किया कि आज हिंदी केवल भावना की भाषा नहीं, बल्कि बाजार की भी भाषा बन चुकी है। फिल्म, टेलीविजन, विज्ञापन, डिजिटल मीडिया, कंटेंट क्रिएशन, अनुवाद और पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी ने रोजगार के लाखों नए अवसर उत्पन्न किए हैं, और इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की मांग तेजी से बढ़ रही है। साथ ही, अंग्रेजी का बढ़ता प्रयोग, हिंदी की अशुद्ध वर्तनी, सोशल मीडिया पर रोमन लिपि में हिंदी लिखने की प्रवृत्ति तथा गुणवत्तापूर्ण सामग्री का अभाव - इन्हें हिंदी के समक्ष आज की प्रमुख चुनौतियों के रूप में चिन्हित किया गया।

मुख्य अतिथि का आह्वान और संकल्प

मुख्य अतिथि श्री दिनेश कुमार गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी दिवस को केवल एक औपचारिक कार्यक्रम बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे भाषा के प्रति सच्चे और सतत प्रयास का प्रतीक बनना चाहिए। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से यह संकल्प लेने का आह्वान किया कि


- हम हिंदी को शुद्ध और सही तरीके से लिखने का प्रयास करेंगे।

- सोशल मीडिया पर देवनागरी लिपि का अधिक प्रयोग करेंगे।

- अपने बच्चों को हिंदी साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे।

- कार्यालयों में हिंदी में काम करने में गर्व महसूस करेंगे।

अपने वक्तव्य के अंत में श्री गुप्ता ने भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियों का स्मरण कराते हुए कहा कि निज भाषा के उत्थान में ही समस्त उन्नति का मूल निहित है, और मातृभाषा के समुचित ज्ञान के बिना मन की पीड़ा कभी दूर नहीं हो सकती।

’काव्य पाठ’

गोष्ठी में कवयित्रियों ऋतु जायसवाल एवं प्रियंका चतुर्वेदी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी भाषा के प्रति अपने भावों एवं विचारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया, जिसे उपस्थित श्रोताओं ने सराहा।

’उपस्थित गणमान्य जन’

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री संजीव जायसवाल संजय ने की तथा मुख्य अतिथि के रूप में श्री दिनेश कुमार गुप्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन एवं संयोजन श्री अजय कुमार मिश्र द्वारा किया गया। इस अवसर पर मंजूश्री संस्था के अध्यक्ष श्री शैलेश श्रीवास्तव, श्री विवेक शुक्ल तथा श्री प्रमोद अग्रहरी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे और उन्होंने कार्यक्रम की सफलता में अपना योगदान दिया।

कार्यक्रम का आयोजन मंजूश्री परिवार की ओर से किया गया, जिसका उद्देश्य हिंदी भाषा के प्रति जनमानस में जागरूकता उत्पन्न करना तथा युवा पीढ़ी को अपनी मातृभाषा के प्रति गौरवान्वित करना है। गोष्ठी का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।



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