*ज्योतिर्मा तमसोगमय सदो मा असतोगमय*
*(आलेख : बादल सरोज)*
जिस तरह आँखों पर पट्टी बांधे-बांधे हाथी की टांग या पूंछ या सूंड को छूकर उसे नहीं समझा जाता, वैसे ही तस्वीर पूरी तभी बनती है, जब अलग-अलग, दिखने में एक दूसरे से अलहदा नजर आने वाले कोण और आयाम मिलाकर और आपस में जोड़कर देखे जाते हैं। पिछले सप्ताह सामने आये कुछ प्रसंगों और घटनाओं के साथ ऐसा ही है। ओड़िसा के स्कूल की किताबों में 1,678 गलतियां, संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा राजस्थान में दी गयी प्रस्थापना, प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन द्वारा खुद लिखकर बताई गयी भारतीय अर्थव्यवस्था की दारुण दशा और दिशा, नीट और सीबीएसई घोटाले को लेकर जंतर मंतर पर बैठे छात्र युवा, बिहार के नालंदा में डिग्री कॉलेज खोलने की मांग करने वाले छात्र-छात्राओं की पुलिस द्वारा पिटाई लगाकर बिहार एसएफआई की अध्यक्ष कांति कुमारी सहित अनेक की गिरफ्तारी और लखनऊ की कोचिंग में आग लगने से 15 युवक-युवतियों की अकाल मृत्यु इसी तरह की, दिखने में अलग, किन्तु असल में एक समग्र का हिस्सा हैं। इन्हें जोड़कर ही इनकी पारस्परिक पूरकता और वजह को समझा जा सकता है।
ओड़िसा में कक्षा 1 से 8 तक के लिए सरकार ने किताबें छपवाई। इनमें ज्ञान कितना है, यह देखा जाना बाकी है, मगर पहले ही पाठ में 1,678 गलतियां सामने आ गयीं। गलतियाँ भी छोटी-मोटी नहीं थी, ऐसी थीं, जिन्हें खुद स्कूल के बच्चे भी पकड़ सकते थे। महान वैज्ञानिक आइजक न्यूटन को महान पायलट बता दिया गया। अपने ही प्रदेश के भूगोल के मामले में दरिद्रता की हद यह थी कि खुद ओड़िसा की विधानसभा की जगह दूर दक्षिण के प्रदेश कर्नाटक की विधानसभा की तस्वीर चिपका दी गयी, अपनी ही नियमगिरि की पर्वत श्रृंखला को झारखण्ड में बता दिया गया। हम्पी के पुराने मंदिर को कोणार्क का सूर्यमंदिर बता दिया गया। वर्तनी और भाषा की अशुद्धियां भी अपार थीं। जिन्होंने इन सारी गलतियों की गिनती जोड़ी है, उनके मुताबिक़ कक्षा 1 से 5 तक की किताबों में 413 अशुद्धियां हैं, कक्षा 6 से 8 तक की किताबों में 1265 गलतियाँ हैं, इनमे भी अकेली कक्षा 8 की किताबों में इनकी तादाद 705 हैं।
प्रदेश के 48600 स्कूलों के 50 लाख से अधिक बच्चों के लिए छापी गयी इन किताबों की कुल संख्या करीब 2 करोड़ 96 लाख है और इन पर हुआ खर्च कोई 50 करोड़ से ज्यादा का है। मुद्दा गलतियों के होने भर का नहीं है, इतनी बड़ी आपराधिक विफलता के बाद सरकार के ढीठपन का है। बजाय किसी तरह के खेद या ग्लानि, माफ़ी या प्रायश्चित भाव के शिक्षा मंत्री ने पहली बार छपने पर हो जाने वाली गलतियाँ बताया और कहा कि शुद्धिपत्र जारी कर दिया गया है। 'नई शिक्षा नीति 2020 लागू करने की जल्दबाजी में ऐसा हुआ' का बहाना भी बनाया गया। पता चला है कि इन किताबों की सामग्री एआई – कृत्रिम बुद्धिमत्ता – वाले डिजिटल एप्प से तैयार करवाई गयी थी। यह सिर्फ किताबों का मामला नहीं है।
जब ओड़िसा में किताबों के साथ संघ के प्रयोगों की यह झड़ी लगी हुई थी, तब उदयपुर में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत इतिहास की नई प्रस्थापनाएं देने में जुटे थे। हल्दीघाटी की लड़ाई की 450वीं जयंती पर पुरखा विहीन संघ के 'पुरखे हड़पो अभियान' के तहत बोलते हुए उन्होंने फरमाया कि इस लड़ाई में महाराणा प्रताप जीते थे। इतना ही नहीं, जो महाराणा प्रताप अपने अग्रिम मोर्चे के मुख्य सेनापति हकीम खां सूरी और छापामार मोर्चे के प्रमुख पुन्जा भील की अगुआई में अकबर की उस सेना से युद्धरत थे, जिसके सेनापति खुद उनके समधी राजा मानसिंह थे, उन महाराणा प्रताप को उन्होंने हिन्दुओं का सूरज तक बता दिया। कहते हैं कि किसी के टोके जाने पर संघ प्रमुख ने कहा कि तथ्य सत्य कुछ भी हो, हमारे इतिहास में तो महाराणा प्रताप ही जीतेंगे। इसे सिर्फ महाराणा प्रताप या हल्दीघाटी से जुड़ा या सीमित मामला नहीं समझा जाना चाहिए।
सीबीएसई की उत्तरपुस्तिकाओं की जांच में हुए घपले के बाद जिन लाखों विद्यार्थियों ने फिर से जांच कराने की मांग की थी, उनमें से अनेक का नतीजा अभी नहीं आया। जिस कथित डिजीलॉकर में इसे आना है, वह खुलने में नहीं आ रहा है। इसे भी सिर्फ ऑनलाइन मार्किंग सिस्टम या डिजिटलीकरण की पगलाई मुहिम का नतीजा मानना ठीक नहीं होगा। यह एक पैटर्न का हिस्सा है।
यह उस महा-जकड़न और विखंडन के आरम्भ से शुरू होकर उसके अंत तक बजने वाले शोक गीत की स्वरलिपि है, जिससे हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता और कारपोरेट के गठबंधन वाली सरकार ने भारत को पूरी तरह से कसकर बाँधने जिद ठानी हुई है। यह इस देश को अज्ञान के अँधेरे, अंधविश्वास के घने जंगल और अतार्किक कूपमंडूकता की कंटीली झाड़ियों में बींध देने के लिए शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त कर देने की दुष्ट परियोजना का विस्तार है। सामाजिक चेतना के परिष्कार की उस समझदारी का तिरस्कार है, जो समाज को सभ्य, मनुष्य को इंसान बनाती है। पिछले बारह वर्षों में केंद्र की सरकार पर पधरने और उससे पहले कुछ प्रदेशों में सत्ता सूत्र हाथ में लेने के बाद से ही भाजपा की आड़ में संघ ने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता पर लिया हुआ है। शिक्षा प्रणाली में यह मानवीय मेधा और बुद्धिमत्ता के किले को फतह करने के लिए नहीं, उसे ढहाने के लिए है। अपने इस किये पर वे प्रमुदित और आल्हादित दोनों हैं।
संघ शताब्दी वर्ष के मौके पर स्वयं संघ प्रमुख ने दावा किया था कि शिक्षा के क्षेत्र में हमने काम काफी अच्छा किया है, अब स्वास्थ्य के क्षेत्र पर ध्यान देने की जरूरत है। पाठ्यक्रमों में फेरबदल, शैक्षणिक शोध और विवेक के निखार वाली प्रणाली के खात्मे, विश्वविद्यालयों पर हमले, विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने से लेकर स्कूल-कालेजों में पीरियड्स से ज्यादा प्रार्थनाएं करवाने आदि-आदि इसी का अंग हैं। यह किस इरादे से किया जा रहा है, इसे मोदी जिन्हें अपना गुरु बताते हैं, उन भैया जी भिड़े से लेकर गोलवलकर तक अनेक बार बयान भी कर चुके हैं और पढ़े-लिखे लोगों को देश के लिए खतरनाक और पढ़े-लिखे समाज को पाश्चात्य धारणा बता चुके हैं।
इस तरह अभी तक शिक्षा का जो सूत्र "तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय" ( मुझे अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो , मुझे असत्य (झूठ/अज्ञान) से सत्य (ज्ञान) की ओर ले चलो) हुआ करता था, उसे संघ-भाजपा राज में उलट कर "ज्योतिर्मा तमसोगमय, सदो मा असतोगमय" (ज्ञान से अज्ञान, प्रकाश से अन्धकार की ओर ले चलो, सत्य से झूठ की ओर ले चलो) कर दिया है।
यह पाठ्यपुस्तकें बदलकर नयी कल्पित, अक्सर झूठी या अर्धसत्य से भरी पुस्तकों को तैयार करने वाले दीनानाथ बतरा का ख़तरा अब सर चढ़कर बोलना है। यह कथित विरासत भी नहीं है : चाणक्य के राजा के पढ़ने पर जोर/ भौतिकवादी दर्शन पढ़ने पर जोर/ यहां वह भी नहीं है। मजेदार बात यह है कि इसका उस कथित महान भारतीय विरासत के साथ भी कोई रिश्ता नहीं है, जिसे यह कुनबा बहाल करना चाहता है । चाणक्य कहते थे कि शासक को सभी भौतिकवादी दर्शनों को पढ़ना चाहिये, इससे उसकी तार्किकता में निखार आयेगा । इन दिनों के शासक इसका ठीक उलट कर रहे हैं : जैसे वे स्वयं हैं, वैसा ही देश को बनाना चाहते हैं : पाशविक, असभ्य और बर्बर।
शिक्षा में से सरकार की वापसी और अंधाधुंध निजीकरण का लाजिमी नतीजा यह है कि भविष्य के प्रति आशंकित माँ-बाप अपनी जीवन भर की कमाई खर्च करके अपने बच्चों को प्राइवेट कोचिंग्स में भेजने को मजबूर हो रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र में हुए कई अध्ययनों के अनुसार नीट जैसी चार-पांच मुख्य प्रवेश परीक्षाओं पर होने वाला निजी खर्च देश के कुल शिक्षा बजट से कहीं अधिक है। इतना विशाल धंधा देखकर शिक्षा उद्योग फ़ैल रहा है – बिना इंतजाम के ही भेड़-बकरियों की तरह देश का भावी भविष्य ठूंसा जा रहा है और लखनऊ जैसे हादसे घट रहे हैं।
शिक्षा के ध्वंस के लिए क्या-क्या किया है, इस पर अनेक बार लिखा जाता रहा है – आगे भी लिखा जाएगा। यहाँ फिलहाल इसके जो नतीजे सामने आ रहे हैं, उन पर नजर डालना इसकी विभीषिका को समझने में मददगार हो सकता है। इसके सामाजिक असर युवाओं – विशेषकर छात्र-छात्राओं -- की बढ़ती आत्महत्याओं में दिखने लगा है। विषाद और अवसाद विस्फोटक होता जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मनोचिकित्सा के विज्ञापनों की बाढ़ से साफ़ है कि इस बात को बाजार भी समझ रहा है और उसमें अपना मुनाफ़ा ढूंढ रहा है। अब इसके आर्थिक असर भी साफ़-साफ़ दिखाई देने लगे हैं। इतने ज्यादा जाहिर और उजागर हो गए हैं कि खुद प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार को बाकायदा अखबारों में लेख लिखकर इनकी भयावहता को स्वयं अपनी कलम से दर्ज करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने इंडियन एक्सप्रेस में दो खंडों में लिखे अपने लेख में माना है कि : “अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर वह लाचार है। बेरोजगारी की समस्या पर सूत्र उसके हाथ से छूट चुके हैं।“
नागेश्वरन ने भारत के “वेल्डर, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन और बढ़ई” युग में पहुँच जाने का एलान करते हुए कहा है कि “भारत में आज ऐसे कामों को इज्जत नहीं दी जाती। उन्हें फैशनेबल नहीं माना जाता। लेकिन मेरी राय में अब ऐसी सोच बदलने की जरूरत है।” उन्होंने कहा कि “रोजगार-केंद्रित मैनुफैक्चरिंग का ढांचा खड़ा करने में हम नाकाम हो चुके हैं और आगे ऐसा करना बेहद कठिन हो गया है। एआई के कारण अभी जो ह्वाइट कॉलर रोजगार हैं, वे भी सिकुड़ते चले जाएंगे। तो भारतीय नौजवानों के लिए प्लंबर, वेल्डर, केयर-गिवर, कारपेंटर बनने और हॉस्पिटलिटी आदि जैसे कार्यों में माहिर होने का विकल्प ही बचा है।“ अपने इस आर्थिक आंकलन में वे लिखते हैं कि “सॉफ्टवेयर, कंप्यूटर साइंस, और एमबीए डिग्री से करियर बनने का युग अब खत्म होने जा रहा है। इसलिए युवाओं को ट्रेड स्किल्स और मानव-केंद्रित पेशों पर ध्यान देना चाहिए। केयर-गिविंग -- बीमार या बुजुर्गों की सेवा -- हॉस्पिटलिटी – अतिथि सत्कार -- और सेवा आधारित उद्योग यानी रहने की सुविधा, खाने-पीने, मनोरंजन और यात्रा से जुड़ी सेवाएं, पाक कला, स्वास्थ्य देखभाल संबंधी सेवाएं, खेल-शिक्षा, मनोवैज्ञानिक परामर्श – काउंसिलिंग - आदि कार्य सीखने की ओर ध्यान देना चाहिए।
इसका कारण भी वे बताते हैं और वह यह है कि भारत एआई –आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस – के मामले में बहुत पीछे छूट गया है। क्यों? इसलिए कि जब दुनिया एआई पर ध्यान दे रही थी, दुनिया भर के देश इसकी शोध पर पैसा खर्च कर रहे थे, तब भारत में रूड़की की आईआईटी में गोबर में एंटी वायरस की खोज पर और भोपाल सहित अनेक विश्वविद्यालयों में गौमूत्र और गोबर में कैंसर की दवा, पौष्टिकता, यहाँ तक कि अमरत्व की औषधि की खोज पर सैकड़ों करोड़ रूपये खर्च किये जा रहे थे। डार्विन कोर्स से हटाये जा रहे थे और मनु आदरपूर्वक बिठाए जा रहे थे। अपने भविष्य के पांवों पर कुल्हाड़ी मारने का यह शौर्य सिर्फ प्यादे नहीं दिखा रहे थे, राजा और वजीर भी पूरे जोशोखरोश के साथ भिड़े हुए थे । जिस देश में स्वयं और समाज में वैज्ञानिक रुझान – साइंटिफिक टेम्पर – विकसित करना नागरिक के कर्तव्य के रूप में संविधान में दर्ज हो, उस देश के प्रधानमंत्री से लेकर अदने मंत्रियों, सांसदों, विधायकों तक अवैज्ञानिक और अन्धविश्वासी बातों को भारत की गौरवशाली महानता और उसके विरोध को देशद्रोह करार दे रहे थे। महामारियों में तालियाँ और थालियाँ बजाकर, गोबर में डुबकी लगाकर देश को दुनिया भर में मजाक का पात्र बना रहे थे।
यह बात तो बिल गेट से लेकर एलन मस्क तक मानते हैं कि दुनिया में साइबर क्रांति एशियाई मेधा के कन्धों पर चढ़कर आई है। उसमें भी दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत, की अत्यंत गुणात्मक योजना है। एक समय था, जब जिसे अमरीका की सिलिकॉन वैली कहा जाता है, उसकी दूसरी भाषा तेलुगु और सम्पर्क भाषा हिंदी हुआ करती थी। आज उसी देश का प्रमुख आर्थिक सलाहकार स्वीकार कर रहा है कि अब हम प्लम्बर, वेल्डर, कारपेंटर और पेशेंट्स के अटेंडेन्ट के सप्लायर देश में बदल गये हैं। यहाँ मक़सद इन कामों के महत्त्व को कम करके दिखाना नहीं – शिक्षण, प्रशिक्षण और कौशल के निखार में बुलाकर लायी गयी पिछाहट को ध्यान में लाना है। यह सिलिकॉन वैली में सूरज की तरह चमकते भारत के भविष्य को गोबर की जैली में बदलना है ।
नागेश्वरन बीमारी की शिनाख्त तो कुछ-कुछ कर रहे हैं, मगर उसकी तोहमत पीड़कों की बजाय उत्पीड़ितों पर मढ़ रहे हैं और दवा ऐसी बता रहे हैं, जो मर्ज़ से भी ज्यादा खतरनाक है। वे कहते हैं कि एआई पर निवेश इसलिए नहीं हो पाता, क्योंकि लोकतंत्र इसमें बाधा बनता है। उनके शब्दों में “बड़े विकासशील देशों में दीर्घकालिक भविष्य के लिहाज से चुनावी लोकतंत्र ढांचागत अनिश्चितिता पैदा करता है।“ इस तरह प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार द्वारा किया गया आर्थिक आंकलन आत्मसाक्षात्कार की ईमानदार कवायद नहीं है। इसकी मंशा कार्पोरेटी हिंदुत्व गठबंधन को उसके वीभत्सतम चरण – खुली तानाशाही – में बदलने के लिए माहौल बनाने का धूर्त काम है। यही हो भी रहा है।
शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की जायज और लोकतान्त्रिक मांग को लेकर जून की तपती गर्मी में देश के छात्र दिल्ली के जंतर मंतर पर बैठे हैं, मंत्री बजाय उनसे संवाद करने के उन्हें दहशतगर्द करार दे रहा है। एक जमाने में जो नालंदा दुनिया भर के प्रमुख शिक्षा केन्द्रों में से एक हुआ करता था, उस नालंदा के नगरनौसा में डिग्री कॉलेज खोले जाने की मांग करने पर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया बिहार की अध्यक्षा काँति कुमारी सहित 39 छात्र-छात्राओं को पुलिस लाठीचार्ज में बुरी तरह से पीटकर जेल में बंद कर दिया जा रहा है। एक बार फिर वही मनुजाये नालंदा पर हमलावर हैं, जिन्होंने पहले के नालंदा को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था।
यह सब जो एक दूसरे से जुड़ा और पूरक है, उसका एजेंडा बहुत आगे का है । इसका इरादा “किसी भी बात को इसलिए मत मानो, क्योंकि वह किसी परंपरा या सदियों से चली आ रही प्रथा का हिस्सा है। किसी भी बात को इसलिए मत मानो कि वह धर्मग्रंथों या शास्त्रों में लिखी है । मेरी कही बात को बिना जांचे-परखे आंख मूंदकर स्वीकार न करें। किसी भी ज्ञान या शिक्षा को अपने तर्क, अनुभव और विश्लेषण की कसौटी पर कसना चाहिए। जब वह बात बुद्धि संगत लगे और सभी के कल्याण व हित में हो, तभी उसे अपने जीवन में अपनाना चाहिए।“ के युगांतरकारी आह्वान से सामाजिक विकास की बेड़ियों को शिथिल और मानसिक विकास को मुक्त करने वाले गौतम बुद्ध के देश को अंधकूप और बंद गुफा में बदलने का है।
अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए अभी हाल में दिए जुमले में मोदी ने 1000 वर्षों की जिस महा-योजना की बात की है वह असल में हजार से कहीं ज्यादा वर्षों में हासिल को मिटाने की ही योजना है, जो ओड़िसा से लखनऊ तक अलग-अलग रूप धारण करके आ रही है। इन्हें तिनकों से नहीं, सिर्फ और केवल प्रतिरोध की आँधियों से पीछे धकेला जा सकता है।
*(लेखक 'लोकजतन'' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव है। संपर्क : 94250-06716)*

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