*कर्नाटक : गर्भाशय विच्छेदन मामला और विकलांग महिलाओं के प्रजनन अधिकारों का सवाल*
*(आलेख : मुरलीधरन, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)*
कर्नाटक उच्च न्यायालय के अभी हाल ही में दिए गए फैसले ने, विकलांगता अधिकारों से जुड़े सबसे कठिन विवादों में से एक को फिर से खोल दिया है। इस मामले में गंभीर रूप से बौद्धिक अक्षमता से ग्रस्त 23 वर्षीय महिला के माता-पिता को उसकी हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालने का ऑपरेशन) कराने की अनुमति दी गई है। सवाल यह है : यह निर्णय कौन करेगा कि कोई व्यक्ति कब सूचित सहमति नहीं दे सकता? क्या यह परिवार, चिकित्सा जगत, न्यायालय या राज्य का अधिकार है? इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज शारीरिक स्वतंत्रता के सम्मान और गंभीर रूप से बौद्धिक अक्षमता के यथार्थ के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित कर सकता है?
इन सवालों के आसान जवाब नहीं हैं। फिर भी, कर्नाटक का मामला न केवल अदालत के फैसले के कारण ध्यान देने योग्य है, बल्कि इसलिए भी ध्यान देने योग्य है कि यह विकलांग महिलाओं के प्रजनन अधिकारों से संबंधित भारत के कानूनी और नीतिगत ढांचे की कमजोरियों को उजागर करता है। यह फैसला सिर्फ एक युवती या एक चिकित्सा प्रक्रिया के बारे में नहीं है। यह स्वतंत्रता और संरक्षण, अधिकारों और देखभाल, और संवैधानिक आदर्शों तथा विकलांग व्यक्तियों और उनके परिवारों की वास्तविकताओं के बीच के तनाव को दर्शाता है।
तथ्यों के आधार पर, मामला ठोस प्रतीत होता है। मनोचिकित्सा, मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान, प्रसूति एवं स्त्री रोग, रेडियोलॉजी और एनेस्थेसियोलॉजी के विशेषज्ञों से युक्त एक बहुविषयक चिकित्सा बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि युवती गंभीर रूप से बौद्धिक और विकासात्मक अक्षमताओं, सेरेब्रल पाल्सी और दौरे की बीमारी से ग्रसित थी। उसकी विकासात्मक आयु लगभग पाँच वर्ष और चार महीने आंकी गई थी और उसका आईक्यू 36 था।
बोर्ड ने सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष निकाला कि वह सूचित सहमति देने की क्षमता से वंचित थी, मासिक धर्म की स्वच्छता का स्वतंत्र रूप से प्रबंधन नहीं कर सकती थी और उसे बार-बार चिकित्सा संबंधी जटिलताएं होती थीं। बोर्ड ने उसके सर्वोत्तम हित में गर्भाशय निकालने की सर्जरी की सिफारिश की। अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, उच्च न्यायालय ने इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया।
अदालत ने इस मामले को जबरन नसबंदी या आनुवंशिक सुधार प्रथाओं से अलग करने का पूरा ध्यान रखा। उसने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि यह निर्णय चिकित्सा आवश्यकता के कारण लिया गया था, न कि स्वयं विकलांगता के कारण, और उसने इस प्रक्रिया की अपरिवर्तनीय प्रकृति पर सावधानीपूर्वक विचार किया था। माता-पिता, जो स्वयं भी बढ़ती उम्र के थे, ने बार-बार होने वाले संक्रमणों और अपनी बेटी की आजीवन देखभाल करने की उनकी घटती क्षमता के बारे में चिंता व्यक्त की। संक्षेप में देखा जाए तो, यह निर्णय मानवीय, सतर्क और प्रक्रियात्मक रूप से ठोस प्रतीत होता है।
लेकिन बड़े सवाल अभी भी बाकी हैं। असली मुद्दा यह नहीं है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने जिम्मेदारी से काम किया या नहीं। असली मुद्दा यह है कि अदालतों से ऐसे मामलों पर फैसला क्यों मांगा जाता है, जो मामले स्पष्ट कानून, व्यापक सार्वजनिक नीति और मजबूत सामुदायिक सहायता प्रणालियों द्वारा निर्देशित होने चाहिए। न्यायिक विवेक, चाहे कितना भी विवेकपूर्ण क्यों न हो, एक सुसंगत अधिकार-आधारित ढांचे का विकल्प नहीं हो सकता।
*एक ऐसा इतिहास जिसे भुलाया नहीं जा सकता*
विकलांग महिलाओं के गर्भाशय को निकालने और नसबंदी से जुड़ी चिंताएँ अचानक उत्पन्न नहीं हुई हैं। विश्वभर में, बौद्धिक और मनोसामाजिक विकलांगता से ग्रस्त महिलाओं को उनकी जानकारी या सहमति के बिना ही अपरिवर्तनीय चिकित्सा प्रक्रियाओं से गुज़ारा गया है। ऐसे हस्तक्षेपों को अक्सर स्वच्छता, संस्थागत सुविधा, यौन शोषण से सुरक्षा या गर्भावस्था की रोकथाम के नाम पर उचित ठहराया गया है।
वास्तव में, वे उन गहरी जड़ें जमा चुकी धारणाओं को दर्शाते हैं कि विकलांग महिलाएं प्रजनन स्वायत्तता का प्रयोग करने में असमर्थ हैं या उनका प्रजनन जीवन अन्य महिलाओं के जीवन से कम महत्वपूर्ण है।
भारत में भी ऐसे कई परेशान करने वाले उदाहरण देखने को मिले हैं। इनमें सबसे कुख्यात घटना पुणे के शिरूर होम में 1994 की है , जहां मनोसामाजिक विकलांगता से ग्रस्त ग्यारह महिलाओं की गर्भाशय सर्जरी की गई थी, जबकि दस अन्य महिलाएं महिला संगठनों द्वारा इस प्रथा का खुलासा किए जाने के बाद ही इस प्रक्रिया से बच पाईं थीं। दरअसल, दिवंगत अहिल्या रांगणेकर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल, जो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (सीपीआई-एम) की पूर्व सांसद और अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एआईडीडब्ल्यूए) की नेता थीं, ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार से हस्तक्षेप का आग्रह किया था, जिससे यह प्रक्रिया रुक गई थी।
इस घटनाक्रम ने उजागर किया कि कैसे संस्थाएँ देखभाल और सुविधा के नाम पर विकलांग महिलाओं की शारीरिक अखंडता को आसानी से नजरअंदाज कर सकती हैं। मासिक धर्म को उचित सहायता की आवश्यकता वाली एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया के बजाय एक प्रशासनिक बोझ के रूप में देखा गया था। संस्थागत कमजोरियों को चिकित्सा औचित्य के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जबकि महिलाओं की आवाज़ लगभग पूरी तरह से अनसुनी कर दी गई थीं।
यह इतिहास ही बताता है कि विकलांगता अधिकार संगठन ऐसे मामलों में सावधानी क्यों बरतते हैं। उनकी चिंता यह नहीं है कि हर गर्भाशय को निकालना (हिस्टेरेक्टॉमी) अपने आप में अवैध है ; बल्कि, उनकी चिंता यह है कि विकलांग महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से पितृसत्तात्मकता, पूर्वाग्रह या संस्थागत उपेक्षा के नाम पर किए गए अपरिवर्तनीय हस्तक्षेपों का असमान बोझ उठाना पड़ता है।
*कागज़ पर अधिकार, व्यवहार में विरोधाभास*
शिरूर घटना के बाद से कानूनी ढांचा निस्संदेह विकसित हुआ है। विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 (आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम, 2016) की धारा 10(2) संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र और सूचित सहमति के बिना बांझपन उत्पन्न करने वाली चिकित्सा प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करती है। यह महत्वपूर्ण प्रावधान इस बात की पुष्टि करता है कि प्रजनन स्वायत्तता विकलांग व्यक्तियों को दी गई गरिमा का अभिन्न अंग है।
आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम लागू होने से पहले ही, सर्वोच्च न्यायालय ने सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन (2009) मामले में प्रजनन संबंधी विकल्प को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग माना था। संवैधानिक सिद्धांतों और संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर सम्मेलन (यूएनसीआरपीडी) सहित अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का हवाला देते हुए, न्यायालय ने यह माना कि बौद्धिक रूप से अक्षम महिला को केवल इसलिए गर्भपात कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि अन्य लोग इसे उसके हित में समझते हैं। इस फैसले को इस बात की पुष्टि के रूप में सराहा गया कि विकलांगता प्रजनन स्वायत्तता को समाप्त नहीं करती है।
बहरहाल, कर्नाटक का मामला मौजूदा कानून की सीमाओं को उजागर करता है। सूचित सहमति का सिद्धांत यह मानता है कि व्यक्ति में चिकित्सा हस्तक्षेप की प्रकृति, जोखिम और परिणामों को समझने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन क्या होता है, जब किसी व्यक्ति की विकलांगता इतनी गंभीर हो कि ऐसी समझ असंभव हो?
कानून चिकित्सकों या अभिभावकों के एकतरफा फैसलों को सही ही खारिज करता है। फिर भी, यह इस बारे में बहुत कम मार्गदर्शन देता है कि सहमति प्राप्त करना व्यावहारिक रूप से संभव न होने पर निर्णय कैसे लिए जाने चाहिए। इसका परिणाम यह होता है कि परिवार, अस्पताल और न्यायाधीश प्रत्येक मामले में नैतिक और कानूनी रूप से अनिश्चित स्थिति में फंसे रहते हैं।
भारतीय कानून में मौजूद अंतर्विरोध तब और भी स्पष्ट हो जाते हैं, जब हम आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम और चिकित्सा गर्भपात अधिनियम के बीच परस्पर संबंध का अध्ययन करते हैं। जहाँ आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम सूचित सहमति के बिना बांझपन पैदा करने वाली प्रक्रियाओं पर रोक लगाता है, वहीं धारा 92 में एक चिंताजनक अपवाद है, जो अभिभावक की सहमति और पंजीकृत चिकित्सक की राय से गंभीर विकलांगता के मामलों में गर्भपात की अनुमति देता है। यह व्यापक प्रावधान कानून में निहित सुरक्षात्मक सिद्धांत को कमजोर करता है और व्यक्तिपरक व्याख्या के लिए काफी गुंजाइश छोड़ता है।
एमटीपी अधिनियम के तहत मानसिक बीमारी और बौद्धिक अक्षमता के बीच किया गया अंतर कई विसंगतियों को जन्म देता है। मानसिक बीमारी से पीड़ित महिला अपने अभिभावक की लिखित सहमति से गर्भपात करा सकती है। बहरहाल, बौद्धिक रूप से अक्षम पीड़ित महिलाओं के मामले में अभिभावक की सहमति मान्य नहीं है, जबकि उनकी स्वयं की सहमति कानूनी रूप से अनिवार्य बनी रहती है, भले ही वे सहमति देने में सक्षम न हों। इस कानूनी असंगति के कारण चिकित्सकों और न्यायालयों दोनों को बार-बार भ्रम का सामना करना पड़ा है।
जेड बनाम बिहार राज्य (2017) का मामला इन अंतर्विरोधों को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। बलात्कार के बाद गर्भवती हुई एक निर्धन महिला, जो हल्की बौद्धिक अक्षमता और एचआईवी से ग्रस्त थी, ने गर्भपात कराने का अनुरोध किया। उसकी इच्छा के बावजूद, सरकारी अस्पताल ने उससे अलग रह रहे पति या पिता की सहमति पर जोर देते हुए प्रक्रिया में देरी की। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, तब तक कानूनी समय सीमा समाप्त हो चुकी थी और उसे गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि न्यायालय ने अधिकारियों की आलोचना की और मुआवजा दिया, लेकिन नुकसान हो चुका था।
ये निर्णय दर्शाते हैं कि भारत का कानूनी ढांचा आंतरिक रूप से असंगत बना हुआ है। न्यायालयों ने प्रजनन संबंधी स्वायत्तता की रक्षा करने का उचित प्रयास किया है, फिर भी जब स्वायत्तता का प्रयोग पारंपरिक तरीकों से नहीं किया जा सकता है, तो उन्हें अभी भी संघर्ष करना पड़ता है।
लेकिन कर्नाटक के फैसले से एक व्यापक प्रश्न भी उठता है जो भारतीय कानून की विसंगतियों से परे है। क्या विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए पारंपरिक "सर्वोत्तम हित" परीक्षण ही पर्याप्त सुरक्षा उपाय है?
दशकों से, विश्व भर की अदालतें कानूनी क्षमता का प्रयोग करने में असमर्थ व्यक्तियों से जुड़े मामलों का फैसला करते समय "सर्वोत्तम हित" के सिद्धांत पर निर्भर रही हैं। हालांकि यह सिद्धांत निःसंदेह नेक इरादे से बनाया गया है, लेकिन विकलांगता अधिकार आंदोलनों ने इसकी अंतर्निहित मान्यताओं को लगातार चुनौती दी है। किसी अन्य व्यक्ति के "सर्वोत्तम हित" में लिए गए निर्णय अक्सर संबंधित व्यक्ति की इच्छाओं के बजाय निर्णय लेने वालों के मूल्यों, चिंताओं और सामाजिक पूर्वाग्रहों को दर्शाते हैं।
सोच में यह बदलाव संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर सम्मेलन (यूएनसीआरपीडी) में परिलक्षित होता है, जो कानूनी क्षमता के पारंपरिक दृष्टिकोण से एक मौलिक बदलाव को दर्शाता है। अनुच्छेद 12 यह मान्यता देता है कि विकलांग व्यक्तियों को अन्य व्यक्तियों के समान कानूनी क्षमता प्राप्त है और राज्यों को यह दायित्व देता है कि वे व्यक्तियों को उस क्षमता का प्रयोग करने के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करें। अनुच्छेद 17 विकलांग व्यक्तियों की शारीरिक और मानसिक अखंडता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 23 विवाह, परिवार और प्रजनन से संबंधित मामलों में उनके समान अधिकारों को मान्यता देता है।
संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की समिति ने सामान्य टिप्पणी संख्या 1 के माध्यम से अनुच्छेद 12 की व्याख्या को और आगे बढ़ाया है। इसमें तर्क दिया गया है कि केवल किसी अन्य व्यक्ति के "सर्वोत्तम हितों" के आकलन पर आधारित प्रतिस्थापन निर्णय लेने की प्रक्रिया को धीरे-धीरे समर्थित निर्णय लेने की प्रक्रिया में परिवर्तित किया जाना चाहिए, जिसमें किसी व्यक्ति की अपनी इच्छा और प्राथमिकताओं को समझने और उनका सम्मान करने का हर संभव प्रयास किया जाता है, चाहे वे किसी भी रूप में व्यक्त की गई हों।
यह दृष्टिकोण कर्नाटक जैसे कठिन मामलों को समाप्त नहीं करता है। कुछ गंभीर रूप से बौद्धिक अक्षमता वाले व्यक्ति पारंपरिक कानूनी मानकों द्वारा मान्यता प्राप्त तरीकों से सूचित विकल्प व्यक्त करने में कभी सक्षम नहीं हो सकते हैं। फिर भी, कन्वेंशन जांच के प्रारंभिक बिंदु को बदलता है। किसी व्यक्ति के सर्वोत्तम हित में दूसरों की राय जानने के बजाय, यह पूछता है कि क्या उस व्यक्ति की प्राथमिकताओं को समझने के लिए हर संभव प्रयास किया गया है और क्या कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों पर विचार किया गया है।
भारतीय कानून में अभी तक इस बदलाव को पूरी तरह से शामिल नहीं किया गया है। इसका परिणाम यह है कि न्यायाधीशों को उन जिम्मेदारियों का निर्वहन करना पड़ रहा है, जो समकालीन विकलांगता अधिकार सिद्धांतों पर आधारित एक व्यापक वैधानिक ढांचे के अंतर्गत आती हैं।
विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों से संबंधित विधेयक पर संसद में विचार-विमर्श के दौरान राष्ट्रीय विकलांग अधिकार मंच (एनपीआरडी) ने इन चिंताओं को संबोधित किया था। 2014 में संसदीय स्थायी समिति को दिए गए अपने ज्ञापन में, संगठन ने तर्क दिया था कि विकलांग लड़कियों या महिलाओं पर गर्भाशय को निकालने की सर्जरी तब तक नहीं की जानी चाहिए, जब तक कि स्त्री रोग विशेषज्ञ और मनोचिकित्सक सहित एक बहु-विषयक टीम यह निष्कर्ष न निकाल ले कि असाध्य रोग संबंधी स्थितियों के कारण गर्भाशय को बचाना चिकित्सकीय रूप से अनुचित है। इसने अभिभावक की सहमति और एक चिकित्सक की राय के आधार पर अपरिवर्तनीय चिकित्सा प्रक्रियाओं की अनुमति देने वाले प्रावधानों को हटाने की भी मांग की थी।
उन सुझावों को स्वीकार नहीं किया गया। परिणामस्वरूप जो कानून बना, उसमें अभी भी अस्पष्टताएं मौजूद हैं, जो असंगत व्याख्या की गुंजाइश छोड़ती हैं और असाधारण रूप से कठिन मामलों का सामना करने वाले न्यायाधीशों पर काफी जिम्मेदारी डालती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय प्रमाण सावधानी बरतने की आवश्यकता को पुष्ट करते हैं। 2026 में एपिडेमियोलॉजिक रिव्यूज़ में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा में पाया गया कि कई देशों में विकलांग महिलाओं में गैर-विकलांग महिलाओं की तुलना में हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालने का ऑपरेशन) कराने की संभावना लगातार अधिक थी। अध्ययन के आधार पर, विकलांग महिलाओं में यह प्रक्रिया कराने की संभावना 1.12 से 2.18 गुना अधिक थी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि समीक्षा में यह निष्कर्ष नहीं निकाला गया कि ये सर्जरी अनिवार्य रूप से अनुचित थीं। बल्कि, इसमें इस बात पर चिंता जताई गई कि कभी-कभी देखभाल करने वालों की चिंता, मासिक धर्म प्रबंधन से जुड़ी कठिनाइयों या जीवन की गुणवत्ता के बारे में धारणाओं के कारण गर्भाशय को निकालने की सर्जरी की सिफारिश की जाती थी, न कि अपरिहार्य चिकित्सा आवश्यकता के कारण। इसमें यह भी बताया गया कि कई स्वास्थ्य पेशेवरों को विकलांगता-विशिष्ट प्रशिक्षण बहुत कम या बिल्कुल नहीं मिलता है, जिससे यह संभावना बढ़ जाती है कि अचेतन पूर्वाग्रह नैदानिक निर्णय लेने को प्रभावित करते हैं।
ये निष्कर्ष भारतीय संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं। गंभीर विकलांगता वाले व्यक्तियों की देखभाल करने वाले परिवारों को, सार्थक सार्वजनिक सहायता के अभाव में, अक्सर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जीवन भर की देखभाल का बोझ मुख्य रूप से माता-पिता, आमतौर पर माताओं पर पड़ता है, जो स्वयं वृद्ध होते हुए भी चौबीसों घंटे सहायता प्रदान करती रहती हैं।
सामुदायिक सहायता सेवाओं तक पहुंच सीमित बनी हुई है। व्यक्तिगत सहायता कार्यक्रम लगभग न के बराबर हैं। राहत देखभाल सेवाएं बहुत कम उपलब्ध हैं। गंभीर विकलांगता से ग्रस्त महिलाओं के लिए मासिक धर्म संबंधी सहायता सेवाओं पर नीतिगत रूप से लगभग कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन अपर्याप्त बनी हुई हैं, जबकि विकलांगता-विशिष्ट स्वास्थ्य सेवाएं दुर्लभ हैं। ऐसी परिस्थितियों में, व्यक्तिगत चिकित्सा उपचार से संबंधित प्रतीत होने वाले निर्णय अक्सर कल्याण प्रणाली की संरचनात्मक विफलताओं से प्रभावित होते हैं।
इसीलिए कर्नाटक मामले को केवल एक विकलांग महिला के प्रजनन अधिकारों और उसके माता-पिता की चिंताओं के बीच के संघर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसा दृष्टिकोण व्यापक वास्तविकता को धुंधला कर देता है। परिवार अक्सर राज्य द्वारा पर्याप्त सामाजिक सहायता प्रदान करने में विफलता के कारण उत्पन्न परिस्थितियों में निर्णय ले रहे होते हैं। वृद्ध माता-पिता, अपनी मृत्यु के बाद अपनी बेटियों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं, और अक्सर ऐसे विकल्पों का सामना करते हैं, जो किसी भी परिवार को नहीं चुनने चाहिए।
इसलिए इसका समाधान न तो अंधाधुंध पितृसत्तात्मकता में निहित है और न ही स्वायत्तता की उस कठोर अवधारणा में, जो गंभीर विकलांगता की वास्तविकताओं को अनदेखा करती है। न ही मामले-दर-मामले के आधार पर न्यायिक विवेकाधिकार एक संतोषजनक दीर्घकालिक समाधान है।
*न्यायिक विवेकाधिकार कानून द्वारा गारंटीकृत अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकता*
भारत को संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन (यूएनसीआरपीडी) के सिद्धांतों पर आधारित एक सुसंगत कानूनी और नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है। आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम और चिकित्सा गर्भपात अधिनियम के बीच के अंतर्विरोधों को विधायी सुधार के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए। समर्थित निर्णय लेने, कानूनी क्षमता के आकलन और उन सीमित परिस्थितियों के संबंध में स्पष्ट वैधानिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है, जिनमें अपरिवर्तनीय प्रक्रियाओं पर विचार किया जा सकता है।
ऐसे प्रत्येक मामले में विकलांगता अधिकार विशेषज्ञता सहित स्वतंत्र बहु-विषयक समीक्षा शामिल होनी चाहिए, साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी कम प्रतिबंधात्मक और प्रतिवर्ती विकल्पों का पूरी तरह से पता लगाया गया हो।
यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि ऐसी प्रक्रियाओं से महिला यौन शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है। इसके अतिरिक्त, ऐसी प्रक्रियाओं का हार्मोन और व्यवहार पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिसे अक्सर ध्यान में नहीं रखा जाता है।
उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि विकलांग महिलाओं के लिए प्रजनन संबंधी न्याय केवल कानूनी सुधारों से ही सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इसके लिए सामुदायिक जीवन, व्यक्तिगत सहायता सेवाएं, राहत देखभाल, सुलभ प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल, देखभालकर्ताओं के लिए सहायता और सामाजिक सुरक्षा में निरंतर सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता है। इन उपायों के बिना, कागज़ पर गारंटीकृत अधिकार परिवारों के सामने आने वाली व्यावहारिक वास्तविकताओं से लगातार कमजोर होते रहेंगे।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत अपना फैसला सुनाते समय विशेषज्ञ चिकित्सा राय पर विशेष ध्यान दिया, गर्भाशय निकालने की प्रक्रिया की अपरिवर्तनीय प्रकृति को मान्यता दी और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने का प्रयास किया। इसलिए इस फैसले को जबरन नसबंदी का समर्थन या विकलांगता अधिकारों से पीछे हटना नहीं समझा जाना चाहिए।
साथ ही, यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि न्यायिक विवेकाधिकार कानून द्वारा प्रदत्त और सार्वजनिक नीति द्वारा समर्थित अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकता। शिरूर होम कांड के तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी, भारत में एक ऐसा व्यापक ढांचा मौजूद नहीं है, जो विकलांग महिलाओं की शारीरिक अखंडता और प्रजनन स्वायत्तता की रक्षा करने के साथ-साथ परिवारों और देखभाल करने वालों के सामने आने वाली वास्तविक चुनौतियों का समाधान कर सके।
कर्नाटक के फैसले ने इस दुविधा को जन्म नहीं दिया ; इसने केवल इसे उजागर किया है। नीति निर्माताओं के समक्ष अधूरा कार्य केवल एक और दुर्व्यवहार को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकलांग महिलाओं को न तो आवश्यक चिकित्सा देखभाल से वंचित किया जाए और न ही उनकी ओर से लिए गए निर्णयों को निष्क्रिय स्थिति में धकेल दिया जाए। समानता के प्रति प्रतिबद्ध समाज को केवल सुरक्षा से कहीं अधिक प्रयास करना चाहिए। उसे ऐसी परिस्थितियाँ बनानी चाहिए, जिनमें विकलांग महिलाएं स्वायत्तता का प्रयोग कर सकें, गरिमापूर्ण जीवन जी सकें और समान नागरिकों के रूप में प्रजनन संबंधी न्याय का आनंद ले सकें।
*(लेखक माकपा के केंद्रीय सचिवमंडल सदस्य और राष्ट्रीय विकलांग अधिकार मंच (एनपीआरडी) के महासचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

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