किसके लिए रेड कार्पेट बिछाएगी कालीन नगरी भदोही?


भदोही लोकसभा सीट पर यूपी में इंडिया गठबंधन की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के इकलौते उम्मीदवार ललितेशपति त्रिपाठी भाजपा और बसपा के साथ त्रिकोणीय मुकाबले में हैं

प्रीतम प्र.शुक्ला/हिंदी संवाद न्यूज़ उत्तर प्रदेश

शायद यही कारण है कि भाजपा ने रमेश की जगह विनोद बिंद को उम्मीदवार चुना है." वहीं भदोही स्थित कालीन निर्माता जनार्दन पांडेय स्वीकार करते हैं कि ब्राह्मण निवर्तमान सांसद से नाराज हैं और इसलिए, वे तृणमूल कांग्रेस के ललितेशपति त्रिपाठी को समर्थन देने का दावा कर रहे थे लेकिन 16 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बाद यहां के हालात बदल गए हैं. अब लोग केवल मोदी के नाम पर ही वोट देने का मन बना रहे हैं.

उधर यूपी में टीएमसी के इकलौते उम्मीदवार ललितेशपति त्रिपाठी के साथ समाजवादी पार्टी (सपा) का कोर वोटबैंक यादव और मुसलमान खड़ा है. यूपी के पूर्व सीएम कमलापति त्रिपाठी के पोते व पूर्व कांग्रेसी, पूर्व विधायक ललितेशपति त्रिपाठी को सपा का पूरा समर्थन मिल रहा है. पार्टी कैडर उनके लिए प्रचार कर रहा है, क्योंकि यूपी में टीएमसी का चुनाव चिह्न लोगों के बीच बहुत परिचित नहीं है. 

ललितेशपति त्रिपाठी स्वीकार करते हैं कि अब भदोही के मतदाताओं ने चुनाव चिह्न को पहचानना शुरू कर दिया है. ललितेश बताते हैं, "पार्टी कार्यकर्ता टीएमसी चिह्न के साथ गांवों का दौरा कर रहे हैं, जिसके पीछे हम कनेक्शन बनाने के लिए सपा के हरे और लाल रंगों का उपयोग कर रहे हैं और लोगों को 'दो डंठल और छह पत्तियां' के बारे में बता रहे हैं. हम प्रतीक को फूल नहीं कह सकते क्योंकि लोग इसे कमल समझ सकते हैं."

यूपी का कालीन केंद्र होने के अलावा, भदोही गैंगस्टर से नेता बने विजय मिश्र जैसे माफिया के खिलाफ कार्रवाई के लिए भी चर्चा में था. विजय मिश्र पर प्रदेश सरकार की कड़ी कार्रवाई को इनके समर्थक ब्राह्मण बनाम ठाकुर की जंग के रूप में भरी प्रचारित कर रहे हैं. इंडिया गठबंधन के नेता भी अंदरखाने इस मुद्दे को उठाकर विजय मिश्र के समर्थक ब्राह्मण मतदाताओं पर डोरे डालने की कोशिश कर रहे हैं. 

स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, "भदोही के राजनीतिक समीकरण निश्चित रूप से जातियों और समुदायों के मकड़जाल में फंसे हुए हैं, लेकिन 16 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बाद, मतदाताओं का मूड, जो कई मुद्दों पर भाजपा से नाराज थे, बदलना शुरू हो गया है."

बसपा में शामिल हुए प्रमुख ब्राह्मण चेहरे रंगनाथ मिश्रा की भाजपा में वापसी से भाजपा को राहत मिली है और पार्टी बसपा के पारंपरिक मतदाताओं पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है. स्थानीय कपड़ा व्यापारी मोहित अग्रवाल कहते हैं, "अच्छी कानून व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ व्यापारी वर्ग को मिला है. हम शांति से कारोबार कर रहे हैं. इसलिए इस चुनाव में व्यापारी वर्ग का इकतरफा समर्थन भाजपा को मिल रहा है."

एक कालीन की फैक्ट्री में एकाउंटेंड मोहम्मद फैयाज कहते हैं, "बेरोजगारी और महंगाई हमारे लिए बहुत गंभीर मुद्दे हैं. चुनाव में हर बेरोजगार इंडिया गठबंधन को ही वोट कर रहा है." राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सियासी पार्टी के मुद्दों को उनके समर्थक मतदाताओं के बीच जगह मिल रही है लेकिन ऐसे मुद्दों के बावजूद, अंततः जाति समीकरण निर्णायक भूमिका निभाएंगे. 

भदोही लोकसभा सीट पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी चुनावी त्रिकोण बनाने की कोशिश कर रही है. बसपा ने यहां पहले अतहर अंसारी को टिकट दिया. बाद में मंडल कोआर्डिनेटर रहे इरफान अहमद बबलू को उम्मीदवार बना दिया. इसके बाद हरिशंकर सिंह उर्फ दादा चौहान को मैदान में उतार दिया. वर्ष 2009 में भदोही लोकसभा सीट जीतने वाली बसपा इस बार काफी सुस्त है जिससे इसके परंपरागत वोटबैंक पर सेंधमारी का प्रयास भाजपा और इंडिया गठबंधन के द्वारा किया जा रहा है.

कालीन उद्योग ने भदोही को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई लेकिन आज यह कठिन दौर से गुजर रहा है. अखिल भारतीय कालीन विनिर्माण संघ (एआईसीएमए) के पूर्व मानद सचिव पीयूष बरनवाल बताते हैं, "भदोही में सालाना लगभग 9,000 करोड़ रुपये का कालीन बनता है. इनमें से हर साल 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के कालीन संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों सहित विभिन्न देशों में निर्यात किए जाते हैं. कालीन उद्योग पांच लाख से अधिक कारीगरों को रोजगार देता है."

कालीन बुनकरों को इस बात का दुख है कि सरकार ने साड़ी बुनकर की तुलना में उनकी उपेक्षा की है. चुनाव में दबी जुबान बुनकरों की खराब माली हालत भी मुद्दों की सूची में शुमार हो रही है. राजनीतिक दांवपेच, जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दों की कसौटी, आखिर में इसी से तय होना है कि किस उम्मीदवार के लिए कालीन नगरी रेड कारपेट बिछाएगी.

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