*प्रबंधित लोकतंत्र : संवैधानिक संस्थाओं को कैसे खोखला किया जा रहा है?* 

*(आलेख : एम.ए. बेबी, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)*


'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' में बताया गया है कि आधुनिक राज्य की कार्यपालिका असल में पूरे बुर्जुआ वर्ग के साझा कामकाज को संभालने वाली एक समिति के अलावा और कुछ नहीं होती। आज के भारत में, इस सूत्र की भी समीक्षा करने की ज़रूरत है। मौजूदा हालात की व्याख्या, एक उदारवादी राज्य के निष्पक्ष तंत्र के ज़रिए पूंजीपति वर्ग के कामकाज को सामान्य ढंग से संभालने से कहीं आगे की चीज़ है। मौजूदा स्थिति गुणात्मक रूप से अलग और अभूतपूर्व है। आज देश में उन सभी संस्थाओं पर कब्ज़ा किया जा रहा है, जिन्हें कार्यपालिका की शक्ति में संतुलन बनाने, उसे नियंत्रित करने या उस पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया था। ये संस्थाएँ अब बड़े पूंजीपतियों के एक खास हिस्से के हितों के अधीन हो गई हैं, जो हिंदुत्व की विचारधारा वाले तंत्र के साथ जैविक रूप से जुड़ गया है। यह फ़र्क हमसे एक स्पष्ट और गहरी समझ के साथ विश्लेषण करने की मांग करता है।


*कॉर्पोरेट राज्य और उसकी राजनैतिक आर्थिकी*


शुरुआत आर्थिक आधार से करते हैं, क्योंकि बाकी सब कुछ उसी से निकलता है। 1991 से भारत में बाज़ार-समर्थक नीतियां रही हैं। बहरहाल, भाजपा के एक दशक के शासनकाल के दौरान कुछ ऐसा हुआ है, जो 2014 तक चली आ रही आम बाज़ार-समर्थक राह से अलग है। 2014 से एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हुई है, जिसने सत्ताधारी पार्टी के राजनीतिक तंत्र और कॉर्पोरेट घरानों के एक खास समूह के बीच विलय को बढ़ावा दिया है। यह आपसी सहयोग इतना गहरा हो गया है कि कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सरकार और निजी पूंजी के बीच का फ़र्क व्यावहारिक रूप से गायब हो गया है।


कॉरपोरेटों ने भाजपा में राजनीतिक निवेश किया है और बदले में उन्हें कई फ़ायदे मिले हैं : जैसे कि सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश, पर्यावरण और भूमि अधिग्रहण की मंज़ूरी के नियमों में बदलाव, और कॉरपोरेट कर्ज़ को खत्म करने के लिए बैंकिंग प्रणाली का पुनर्गठन आदि। इस मामले में इससे भी अहम बात यह है कि कॉरपोरेट निवेश के रिटर्न के तौर पर राजनीतिक सत्ता को ही व्यवस्थित किया गया है। ये सभी बातें लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी और उनके मित्रों की ज़रूरतों के हिसाब से धीरे-धीरे इस व्यवस्था का चरित्र ही बदला जा रहा है।


*अधिग्रहण, विलय और नये किस्म का संचय*


कॉर्पोरेट वित्त की भाषा -- अधिग्रहण, विलय, द्वेषपूर्ण अधिग्रहण आदि -- बहुत सटीकता के साथ राजनीतिक कामकाज में घुसपैठ कर चुकी है। कॉर्पोरेट बोर्डरूम में अक्सर विलय और अधिग्रहण शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसे राजनीति के क्षेत्र में, भाजपा ने चुनावी मजबूती के वर्चस्वशाली   तकनीक के रूप में पूरी तरह से अपना लिया है।


इसकी शुरुआत मध्य प्रदेश, कर्नाटक और मणिपुर जैसे राज्यों में कांग्रेस के चुने हुए विधायकों को संगठित तरीके से तोड़ने और बड़े पैमाने पर खरीदने के ज़रिए सरकारों को गिराने से हुई। कांग्रेस, जो पहले से ही अपने विरोधाभासों के कारण कमज़ोर थी, इस दलबदल से और भी कमज़ोर हो गई। ये दलबदल बाहर से करवाए गए थे और यह मतदाताओं के जनादेश पर क्रूर हमला था। ऐसा कानूनी अस्पष्टता का फ़ायदा उठाकर किया गया।


बाद में शिवसेना, आप और तृणमूल कांग्रेस को निशाना बनाया गया। एकनाथ शिंदे का शिवसेना के विधायक दल पर कब्ज़ा करना, अजित पवार का एनसीपी को तोड़ना और राघव चड्ढा का छह अन्य सांसदों के साथ भाजपा में शामिल होना — ये सब कॉर्पोरेट अधिग्रहण जैसा था, जिसमें लालच, समय-सीमा और विलय के बाद मिलने वाले इनाम जैसी चीज़ें शामिल थीं। राजनीतिक नेताओं की "वायदा व्यापार" (फ्यूचर ट्रेडिंग) इतनी आम बात हो गई है कि अब इसे शायद ही कोई घोटाला मानता है।


ये गतिविधियाँ परिसीमन के बड़े सवाल से जुड़ी हैं और इस विश्लेषण के दूसरे हिस्से में यह बात और साफ़ हो जाएगी। फ़िलहाल, इतना जानना ही काफ़ी है कि भूमि अधिग्रहण का गणित राजनीतिक भूगोल के गणित से गहराई से जुड़ा हुआ है।


*वॉशिंग मशीन*


राजनीतिक शब्दावली का एक शब्द, "वॉशिंग मशीन" आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है और इसके पीछे एक ठोस वजह है। विपक्ष का कोई नेता, जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप हों, आपराधिक मामले चल रहे हों, ईडी का बुलावा आया हों -- यानी राजनीतिक दबाव बनाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली जांच एजेंसियों का दबाव जिस पर हो — वही नेता पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो जाता है। फिर वह हैरानी से देखता है कि कैसे उसके खिलाफ मामले कमज़ोर पड़ने लगते हैं, समन आने कम हो जाते हैं और मुकदमा चलाने की जल्दबाजी या सख्ती गायब हो जाती है।


आज एक ऐसी अलिखित और बिना संहिताबद्ध नीति को लागू होते देखना मुश्किल नहीं है, जो इतनी सुसंगत है कि एक सिद्धांत बन गई है। यह एक साथ दो काम करती है। यह मुक़दमे के लगातार डर से विपक्ष को अनुशासित रखती है। और यह दल-बदल करने वालों को बिना सज़ा के छोड़ देती है, जिससे भाजपा  का विपक्ष के नेताओं को दिया गया ऑफ़र उन लोगों के लिए बहुत आकर्षक हो जाता है, जिन पर कार्रवाई का ख़तरा हो। जब क़ानून का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से होता है और वह सबूत के बजाय राजनीतिक वफ़ादारी पर आधारित हो जाता है, तो क़ानून का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता ; वह बस क़ानून का चोला पहने हुए उत्पीड़न बन जाता है।


*दल-बदल विरोधी कानून : बिना नींव की इमारत*


ऊपर उल्लेखित बड़े पैमाने पर होने वाले राजनीतिक सौदों को रोकने के लिए, 1985 में दसवीं अनुसूची, जिसे आम तौर पर दल-बदल विरोधी कानून के नाम से जाना जाता है, लागू की गई थी। हालाँकि दसवीं अनुसूची की कमियाँ शुरू से ही साफ़ थीं, फिर भी यह इस बात की संवैधानिक मान्यता थी कि विधायकों की खरीद-फरोख्त प्रतिनिधि लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है।


अब उस बात को बस रस्म-अदायगी बना दिया गया है। "विलय" (जिसके लिए किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों के दल-बदल की ज़रूरत होती है) के तरीके का बहुत ही 6चालाकी और कुशलता से गलत इस्तेमाल किया गया है। स्पीकर, जो अयोग्यता से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला करने वाले संवैधानिक अधिकारी होते हैं, जब भी याचिकाएं उनकी अपनी पार्टी के लोगों से जुड़ी होती हैं, तो वे प्रक्रिया में देरी करने के नए-नए तरीके ढूंढ निकालते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन तरीकों को देखा है, नाराज़गी जताई है और निर्देश भी दिए हैं, फिर भी यह सिलसिला जारी है। आज दल-बदल विरोधी कानून एक ऐसी इमारत की तरह है, जिसकी नींव चुपचाप ढहा दी गई है ; बस उसका बाहरी ढांचा भर खड़ा है।


*पीठासीन अधिकारी और चुनाव आयोग: अधीनता का ढांचा*


लोकसभा अध्यक्ष, राज्यपाल और भारत का चुनाव आयोग — ये कुछ ऐसे संवैधानिक पद हैं, जिन्हें संवैधानिक व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने वाले या रेफरी की भूमिका निभाने के लिए बनाया गया था। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें यह मानकर चला जाता है कि खेल में शामिल खिलाड़ी ही रेफरी के मालिक नहीं होंगे।


बहरहाल, अब यह मान्यता सही नहीं है। तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों के पक्षपाती कामकाज पर विस्तार से चर्चा हुई है और इसका दस्तावेज़ीकरण हुआ है। ये राज्यपाल संवैधानिक संकट पैदा करते हैं, विधेयको को रोककर रखते हैं और संवैधानिक प्रमुख के तौर पर अपनी भूमिका निभाने के बजाय केंद्र सरकार के विस्तार या मोहरे के तौर पर काम करते हैं। उनके कामकाज से पता चलता है कि चीज़ें बदल रही हैं, और संवैधानिक कार्यालयों को सक्रिय रूप से राजनैतिक औजारों में बदला जा रहा है।


चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी संभालने वाले पीठासीन अधिकारियों और चुनाव अधिकारियों के कामकाज में भी यही  प्रवृत्ति दिखाई देती है। मध्य प्रदेश और झारखंड में राज्यसभा चुनावों से जुड़े हाल के विवादों और चंडीगढ़ मेयर चुनाव – जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि चुनाव अधिकारी ने चुनावी प्रक्रिया में गैर-कानूनी तरीके से दखल दिया था – ने उन अधिकारियों की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनसे निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर काम करने की उम्मीद की जाती है। ये घटनाएँ इस बढ़ती धारणा को और मज़बूत करती हैं कि प्रक्रिया को संचालित करने वाले अधिकारी भी अब पक्षपाती प्रभाव में आ सकते हैं।


चुनाव आयोग के कामकाज पर अलग से ध्यान देने की ज़रूरत है, क्योंकि चुनाव आयोग कोई मामूली संस्था नहीं है। यह वह संस्था है, जिसकी आज़ादी पर ही चुनावी लोकतंत्र का पूरा आधार टिका है। और हाल के सालों में इसके कामकाज पर ऐसे सवाल उठे हैं, जिनका जवाब सिर्फ़ नियमों या प्रक्रियाओं का हवाला देकर नहीं दिया जा सकता। इसका साफ़ दिखाई देने वाला एक उदाहरण यह है कि चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के उन भाषणों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई करने से साफ़ इंकार कर दिया, जो 'आदर्श आचार संहिता' के किसी भी नज़रिए से सांप्रदायिक अपील माने जा सकते थे। चुनाव आयोग का पक्षपाती रवैया तब और भी साफ़ हो जाता है, जब प्रधानमंत्री कांग्रेस पर "देश की संपत्ति घुसपैठियों में बांटने" का आरोप लगाते हैं और "मंगलसूत्र" का ज़िक्र करते हैं, या जब गृह मंत्री धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं, और चुनाव आयोग को इसमें कोई उल्लंघन नहीं दिखता।


*मुख्य न्यायाधीश अब इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं*


मार्च 2023 में, सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में यह निर्देश दिया था कि चुनाव आयोग में नियुक्तियाँ एक ऐसी समिति की सलाह पर की जाएँ, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। फैसले में साफ़ तौर पर कहा गया था कि नियुक्तियों को पूरी तरह से कार्यपालिका के हाथों में छोड़ना "हमारे लोकतंत्र की सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह" है।


अपने अनैतिक हितों से जुड़े सभी मामलों की तरह, यहाँ भी सरकार का रवैया तेज़ और सटीक था। दिसंबर 2023 तक, संसद ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' पारित कर दिया था। इस कानून ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। अब चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की पसंद का एक मंत्री शामिल होता है। तीन में से दो वोट सरकार (कार्यपालिका) के ही होते हैं।


यह बात नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती कि लोकसभा में यह विधेयक तब पारित हुआ, जब विपक्ष के ज़्यादातर सदस्य निलंबित थे। 2023 के इस कानून को चुनौती देने वाले मामले जनवरी 2024 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं और इस पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। मई 2026 की स्थिति तक, इस मामले पर अभी भी डिवीज़न बेंच के सामने बहस ही चल रही है और इस दौरान दो मुख्य न्यायाधीशों ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया है। इस विवादित कानून के तहत नियुक्त चुनाव आयुक्त अपने पद पर बने हुए हैं और चुनाव की प्रक्रिया जारी है।


*अध्यादेश और जम्मू-कश्मीर का तरीका*


इस संदर्भ में संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार करने के दो और घटनाओं का ज़िक्र करना ज़रूरी है, क्योंकि इनसे ऐसे फ़ैसलों से निपटने का तरीका सामने आता है, जो सरकार के लिए सुविधाजनक नहीं होते।


पहला मामला मई 2023 का है, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की चुनी हुई सरकार को 'सेवाओं' पर नियंत्रण वापस दिलाया। संवैधानिक लोकतंत्र में यह एक बुनियादी महत्व का मामला है, क्योंकि यहाँ एक शहर-राज्य की चुनी हुई सरकार को सिर्फ़ नाममात्र की संस्था बनाकर रख दिया गया था। इस फैसले के कुछ ही दिनों बाद, केंद्र सरकार एक अध्यादेश लेकर आई, जिसे खास तौर पर इस फ़ैसले के असर को खत्म करने के लिए बनाया गया था। बाद में इस अध्यादेश को कानून का रूप दे दिया गया। सरकार को कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि वह कार्यपालिका के विधायी बहुमत के ज़रिए आसानी से इसे दरकिनार कर सकती थी।


दूसरा उदाहरण जम्मू-कश्मीर का है। राज्य विधानसभा के काम न करने की स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए, कई संवैधानिक कदमों की श्रृंखला के ज़रिए, अनुच्छेद 370 को हटा दिया गया और एक पूरे राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया। यह बताना ज़रूरी है कि इनमें से एक केंद्र-शासित प्रदेश लद्दाख है, जहाँ कोई विधानसभा ही नहीं है। अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति के आदेश का इस्तेमाल करके ऐसे बदलाव किए गए, जिनके लिए अनुच्छेद 370 के अनुसार राज्य की संविधान सभा की सहमति ज़रूरी थी, लेकिन वह संविधान सभा अब मौजूद ही नहीं थी। सहमति की संवैधानिक ज़रूरत को इस आसान तथ्य से दरकिनार कर दिया गया कि उसे पहले ही खत्म कर दिया गया था। यह सत्ताधारी पार्टी द्वारा अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए एक कानूनी खामी (लूपहोल) पैदा करने का मामला था।


*एक ढांचा तैयार करना*


ऊपर बताई गई बातों से यह साफ़ होता है कि संस्थाओं पर कब्ज़ा करने की भाजपा की परियोजना एक ऐसे ढांचे की तरह है, जिसमें हर हिस्सा दूसरे हिस्से को मज़बूत करता है। चुनाव आयोग को खोखला करने से चुनावों में हेर-फेर करना आसान हो जाता है। दल-बदल विरोधी कानून को बेअसर करने से चुनाव के बाद हेर-फेर करना आसान हो जाता है। 'वॉशिंग मशीन' दल-बदल को और आकर्षक बनाती है। अध्यादेश लाने की शक्ति और जम्मू-कश्मीर का तरीका यह दिखाता हैं कि न्यायिक विरोध को भी दबाया या अपने हिसाब से ढाला जा सकता है। और उसकी बात मानने वाले पीठासीन अधिकारी यह सुनिश्चित करते हैं कि जवाबदेही तय करने वाली प्रक्रियाएं (जैसे अयोग्यता की याचिकाएं, धन विधेयक प्रमाणीकरण,  दल-बदल विरोधी कार्यवाही वगैरह) धीमी पड़ जाएं या रुक जाएं।


इस ढांचे का मकसद सिर्फ़ सत्ता बनाए रखना नहीं है। इसे जनसांख्यिकीय बदलाव, नागरिकता को फिर से व्यवस्थित करने और हिंदू राष्ट्र की परियोजना को सहारा देने के लिए खड़ा किया जा रहा है। 


*(लेखक पूर्व सांसद और माकपा के महासचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

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