उतरौला बलरामपुर - तहसील क्षेत्र अन्तर्गत ग्राम पंचायत गायडीह में एक बेहद खास, दिल को छू लेने वाली और आस्था से जुड़ी तस्वीर सामने आई हैं। जहां हज़रत इमाम हसन और इमाम हुसैन की याद में कई वर्षों से रखे जा रहे ताजिए की परम्परा इस बार भी पूरे शबाब पर दिखाई दे रही है।लेकिन इस बार गायडीह खास का ताजिया सिर्फ एक धार्मिक परम्परा नहीं, बल्कि आस्था, एकता, कला और समर्पण का एक शानदार प्रतीक बनकर उभरा है।ग्राम गायडीह खास में इस बार जो ताजिया तैयार किया गया है,वह अप नी खूब सूरती,भव्यता और बारीक कारीगरी की वजह से हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। बताया जा रहा है कि इस ताजिए में गुम्बदे खजरा और मदीना शरीिफ का बेहद खूबसूरत नक्शा उकेरा गया है, जिसे देखने वाला हर शख्स उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह पा रहा। ताजिए की बनावट, उसकी सजा वट, और उसकी नफा सत और उसकी रूहा नी झलक सब कुछ ऐसा है मानो कला और अकीदत का संगम एक ही जगह उतर आया हो। जानकारी के मुता बिक, ग्राम गायडीह खास में वर्षों से रखे जा रहे, इस ताजिए का निर्माण इस बार मुम्बई में ही कारीगरों के द्वारा किया गया है।इन कारी गरों ने अपनी महीन मेहनत और बेमिसाल हुनर से ताजिए को ऐसा रूप दिया है कि वह पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है।
ताजिए में की गई कारी गरी सिर्फ सजावट ही नहीं है, बल्कि उसमें धार्मिक प्रतीकों की पवित्रता, ऐतिहासिक सम्मान और भावनात्म क जुड़ाव साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है। हसनी हुसैनी कमेटी के सदस्यों ने जानकारी देते हुए बताया कि इस खूब सूरत गुम्बदे खज रा और मदीना शरीफ के नक्शे को तराशने और ताजिए को भव्य रूप देने में करीब साढ़े तीन लाख रुपये की लागत बनाईं गई है। गांव के स्तर पर इतनी बड़ी लागत से इस तरह का ताजिया तैयार होना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है, बल्कि यह उस मोहब्बत उस अकीदत और उस जज़्बे की मिसाल है जो लोग इमाम हसन और इमाम हुसैन की याद को अपने दिलों में रखते हैं। कमेटी के सदस्यों का कहना है कि ताजिए की तैयारी में सिर्फ धन ही नहीं, बल्कि गांव के लोगों की मेहनत, सहयोग, लगन और धार्मिक भावना भी बराबर शामिल रही है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर किसी के चेहरे पर इस ताजिए को लेकर एक अलग ही खुशी और गर्व देखने को मिल रहा है। गांव के लोग इसे अपनी पह चान अपनी परम्परा और अपने सम्मान से जोड़ कर देख रहे हैं। ग्राम गायडीह खास के बड़े बुजुर्गों ने बताया कि हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन की याद में रखा जा रहा है। ग्राम गाय डीह का ताजिया अपने आप में एक मिसाल कायम है। यह सिर्फ एक ढांचा नहीं, बल्कि वह निशानी है,जो लोगों को कर्बला की कुर्बानी, सब्र, इंसाफ, हक और इंसानियत के पैगाम को याद दिलाती है। मुहर्रम का महीना जहां गम,अकीदत और याद का महीना माना जाता है, वहीं ऐसे ताजिए उस रूहा नी माहौल को और गहरा कर देते हैं। ग्राम गायडीह ख़ास का यह ताजिया भी उसी एह सास को ज़िन्दा करता हुआ नजर आता है। ताजिए की खूबसूरती को देखने के लिएआस पास के लोगों में भी खास उत्साह भी दिखा ई रहा हैं। हसनी हुसैनी कमेटी के मेंबरों ने क्षेत्र वासियों सेअपील की है कि वे एक बार जरूर पहुंचकर इस खूब सूरत ताजिए का दीदार करें, और इस बेमिसाल कारीगरी को करीब से देखें। कमेटी का कहना है कि यह सिर्फ एक धार्मिकआयो जन नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक एक जुटता और मोहब्बत की तस्वीर भी है, जिसे देखकर हर कोई प्रभा वित हो रहा है। ताजिए के आस पास मौजूद माहौल भी अपने आप में बेहद खास नजर आता दिखाई दे रहा है। एक तरफ बुजुर्गों की आंखों में अकीदत और पुरानी परम्पराओं की यादें भी दिखाई देती हैं, तो दूसरी तरफ बच्चे भी इस ताजिए को लेकर खासे उत्साहित नजर आते हुए दिखाई दे रहे हैं।यानी गायडीह खास का यह ताजिया सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली एक ऐसी विरासत बन चुका है, जो हर साल लोगों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर देती है। अगर गौर किया जाए, तो ऐसे आयोजन सिर्फ धार्मिक भावना तक सीमित नहीं रहते हैं, बल्कि यह गांव की सामाजिक एकता, आपसी भाई चारा और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करते हैं। ग्राम गायडीह ख़ास में तैयार किया गया यह खूब सूरत ताजिया इस बात का सबूत है कि जब लोगों के दिलों में मोहब्बत,अकीदत और इखलास हो, तो फिर कोई भी परम्परा सिर्फ रस्म नहीं रहती हैबल्कि वह इबादत, इज्जत और पहचान बन जाती है।
हिन्दी संवाद न्यूज से
असगर अली की खबर
उतरौला बलरामपुर।
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