उतरौला बलरामपुर भारत का संविधान केवल शासन का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की चेतना से प्रेरित एक जीवन्त संकल्प है,विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(UGC) के द्वारा जनवरी 2026 में अधिसूचित “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations” इसी संवैधानिक चेतना का दावा करते हैं।
उद्देश्य से स्पष्ट है—उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की समाप्ति और समान अवसर की स्थापना।परन्तु प्रश्न यह है कि क्या इन नियमों की संरचना और परिभाषाएँ वास्तव में उसी सन्तुलन को साध पाती हैं, जिसकी अपेक्षा संविधान करता है। नए नियमों के तहत विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में Equal Opportunity Centre, Equity Committees, Equity Squads, 24×7 हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल जैसी व्यवस्थाएँ अनिवार्य की गई हैं। पहली दृष्टि में यह एक सशक्त और सक्रिय प्रशासनिक ढाँचा प्रतीत होता है। तर्क यह है, कि बढ़ते भेदभाव के मामलों से निपटने के लिए सतत निगरानी भी एक आवश्यक है। परन्तु यही निगरानी जब अत्यधिक संरचनात्मक हो जाती है, तब यह आशंका जन्म लेती है, कि कहीं शैक्षणिक संस्थान ज्ञान के केन्द्र से अधिक नियामक प्रयोगशालाएँ तो नहीं बनते जा रहे।
शिकायत निस्तारण के लिए निर्धारित समय- सीमा— 24 घंटे में स्वीकृति,15 कार्य दिवस में रिपोर्ट और 7 दिनों में कार्यवाही —प्रशासनिक दक्षता का प्रतीक कही जा सकती है। किन्तु सामाजिक और मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न जैसे जटिल विषयों को क्याकेवल समय-सारणी में बाँधकर न्याय संगत ढंग से सुलझाया जा सकता है न्याय की गति आवश्य क है, किन्तु उसकी गहराई और निष्पक्षता उससे भी अधिक मानी जाती है। इन नियमों का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू है। भेद भाव की परिभाषा। “जाति-आधारित भेद भाव” को मुख्यतः SC, STऔर OBC समुदायों तक सीमित रखा गया है। आलोचकों का कहना है कि समानता का सिद्धान्त यदि सार्वभौमिक है, तो उसकी सुरक्षा भी सार्वभौमिक क्यों नहीं है।यहीं से यह आशंका जन्म लेती है, कि नियम कहीं समावेशन से अधिक वर्गीकरण को तो प्रोत्साहित नहीं कर रहे। इसी अस्पष्टता और संभावित दुरुपयोग के आधार पर मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा है, जहाँ कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई गई। न्यायालय की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण है, कि कोई भी नियमन केवल सद्भावना से नहीं बल्कि स्पष्टता, सन्तुलन और संवैधानिक मर्यादा से वैध ठहरता है।
संवैधानिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है, कि आरक्षण और विशेष संरक्षण की व्यवस्था एक संक्रमणकालीन समाज की आवश्यक ता थी — ताकि सदियों के सामाजिक अन्याय को सुधारा जा सके, और राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा सके। परन्तु आज यह प्रश्न अनिवार्य हो गया है, कि क्या सामाजिक न्याय की नीतियाँ अपने मूल उद्देश्य से भटककर राजनीतिक उपयोगिता का साधन बनती जा रही हैं। वर्तमान भारत में,जब शिक्षा, रोजगार, शोध और नवाचार जैसे मूल मुद्दे प्राथमिकता की माँग कर रहे हैं, तब पहचान-आधारित विमर्श का लगातार तीखा होना एक चिन्ता का विषय है। मीडिया, राजनीति और नीति—तीनों यदि अपना सन्तुलन खो दें, तो उसका सबसे बड़ा मूल्य देश का युवा वर्ग चुकाता है। UGC के 2026 के नियम निस्संदेह एक गम्भीर प्रयास हैं, परन्तु किसी भी लोकतांत्रिक समाज में उद्देश्य की पवित्रता के साथ-साथ प्रक्रिया की निष्पक्षता भी उतनी ही आवश्यक होती है।
यदि समानता को सच मुच स्थापित करना है, तो नियमों को भय और दंड से नहीं, बल्कि विवेक, स्पष्टता और सर्व समावेशी दृष्टि से संचालित करना होगा।अन्यथा, यह विडम्बना बनी रहेगी कि जिस एकता को मजबूत करने के लिए नियम बनाए गए,
वही एकता असंतुलित नीतियों के कारण सबसे अधिक प्रभावित हो जाए।
हिन्दी संवाद न्यूज से
असगर अली की खबर
उतरौला बलरामपुर।
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