उतरौला बलरामपुर- नगर के सबसे व्यस्त क्षेत्रों में शामिल तहसील के मुख्य द्वार व श्यामा प्रसाद मुखर्जी चौराहे के आस पास इन दिनों जो दृश्य देखने को मिलरहा है,वह न केवल चिन्ता जनक है, बल्कि कानून संवेदन शीलताऔर पर्यावरण तीनों के लिए एक चुनौती बनता ही जा रहा है। खुलेआम हरे रंग के तोतों को एक छोटे-छोटे लोहे के पिंज रों में भरकर बाजारों में लाकर ग्राहकों को आक र्षित कर उनका अवैध तरीके से क्रय–विक्रय किया जा रहा है। यह दृश्य केवल एक अवैध व्यापार का नहीं, बल्कि वन्य जीवों के प्रति मान वीय क्रूरता और कानून के प्रति उदासीनता का प्रतीक बना हुआ है। कई पिंजरों में एक साथ ठूंसे गए तोते न हवा पा रहे हैं, और न ही दाना- पानी—जिससे उनका जीवन सीधा खतरे में पड़ जाता है। यह व्यव हार पशु क्रूरता का स्पष्ट एक उदाहरण है। भार तीय कानून में हरा तोता वन्य जीव संरक्षण अधि नियम के तहत 1972 के अन्तर्गत संरक्षित प्रजाति में शामिल है। धारा 9 के अनुसार किसी भी संरक्षित वन्य जीव का पकड़ना,रख ना या बेचना पूर्णतःप्रति बंधित है। धारा 39 यह स्पष्ट करती है कि संरक्षित वन्यजीव राज्य की सम्पत्ति होते हैं, उन्हें निजी स्वामित्व में नहीं रखा जा सकता। धारा 49 के तहत वन्यजीवों का व्यापार, परिवहन और बिक्री अपराध है। धारा 51 के अन्तर्गत दोष सिद्ध होने पर 3 से 7 वर्ष तक काकारावास और न्यूनतम 10,000 रुपए से लेकर 25,000रुपये या उससे अधिक का जुर्माना तथा पुनरावृत्ति पर और कठो र सजा का प्रावधान बनता है। इसके अति रिक्त, पशु क्रूरता निवा रण अधिनियम,1960 की धारा 11 के तहत किसी भी पशु या पक्षी को अनावश्यक पीड़ा देना एक दंडनीय अप राध है, जिसमें जुर्माना और कारावास दोनों का प्रावधान है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार का अवैध पक्षी व्यापार पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ता है, प्राकृतिक परागण और बीज प्रसार जैसी जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित भी करता है, और पक्षियों की संख्या में भी गिरावट लाता है, और सबसे खतरनाक यह कि बच्चों और युवाओं में गलत सन्देश देता है, कि कानून तोड़ना एक सामान्य बात है।
सबसे अहम प्रश्न यह है कि इतने व्यस्त और सार्वजनिक स्थानों पर यह अवैध व्यापार कैसे फल-फूल रहा है, क्या वन विभाग की निगरानी पर्याप्त नहीं है क्या स्था नीय पुलिस और नगर पालिका की नियमित गश्त प्रभावी है, क्या अब तक किसी भी अवैध कारोबारी पर ठोस कार्यवाही हुई है, इन सवालों का उत्तर न मिलना प्रशासनिक तंत्र पर गम्भीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है,वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है। जागरूक नागरिकों की भूमिका इसमें निर्णायक भी हो सकती है।
समाज के लोगों को चाहिए, कि कोई भी व्यक्ति पक्षी या वन्य जीव न खरीदे, ऐसे मामलों की सूचनातुरन्त वन विभाग, स्थानीय पुलिस या प्रशासन को दे,और बच्चों को यह सिखाए कि पक्षी पिंजरे के लिए नहीं,आकाश के लिए बने हैं। नगर में पक्षियों का अवैध क्रय विक्रय केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि प्रकृति के विरुद्ध एक अपराध है। यदि समय रहते इस पर कठोर कार्यवाही, निरन्तर निगरानी और जन- जागरूकता नहीं हुई, तो इसका दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। अब जरूरत है कि प्रशासन शून्य सहनशीलता नीति अपनाए और समाज भी वन्यजीवों की रक्षा के लिए आगे आए, ताकि उन्हें उनका स्वाभाविक और सुरक्षित जीवन भी मिल सके।

           हिन्दी संवाद न्यूज से
          असगर अली की खबर
           उतरौला बलरामपुर। 


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