गैर-बोवाइन दूध के वर्तमान परिदृश्य एवं भविष्य की संभावनाओं पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित
भा.कृ.अ.प.-केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मखदूम में राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एन.एल.एम) परियोजना के अंतर्गत “भारत में गैर-बोवाइन दूध की वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की संभावनाएँ” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन दिनांक 25 सितम्बर 2026 को किया गया । कार्यशाला में बकरी, भेड़, गदही एवं ऊँट के दूध के उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, विपणन तथा इस क्षेत्र में उपलब्ध भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया ।
कार्यशाला के मुख्य अतिथि मेजर जनरल (डॉ.) श्रीकांत, पूर्व कुलपति, लुवास रहे । कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. ए.के. तोमर, निदेशक, आईसीएआर-सीएसडब्ल्यूआरआई, अविकानगर; डॉ. ए.के. पुनिया, निदेशक, राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर; डॉ. शिव कुमार, आईसीएआर-एनआईएपी, नई दिल्ली तथा डॉ. पी.के. कौशिक, उप निदेशक, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली उपस्थित रहे। कार्यशाला में वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, अधिकारियों, पशुपालकों एवं अन्य संबंधित हितधारकों ने भाग लिया ।
कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य भारत में गैर-बोवाइन दूध की वर्तमान स्थिति, उत्पादन क्षमता, चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं पर वैज्ञानिक एवं नीतिगत स्तर पर विचार-विमर्श करना था। इसके अंतर्गत बकरी, भेड़, गदही एवं ऊँट के दूध की उत्पादकता में वृद्धि, वैज्ञानिक प्रबंधन एवं प्रजनन, गुणवत्तापूर्ण दुग्ध उत्पादन, संगठित दुग्ध संग्रहण, प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन तथा बाजार व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर विशेष चर्चा की गई ।
कार्यशाला ने वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, पशुपालकों, उद्यमियों एवं अन्य हितधारकों को एक साझा मंच प्रदान किया, जहाँ नवीनतम अनुसंधान, तकनीकी उपलब्धियों तथा क्षेत्रीय अनुभवों को साझा किया गया ।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉ. मनीष कुमार चेटली, निदेशक, आईसीएआर-सीआईआरजी ने कहा कि भारत में गैर-बोवाइन दूध देश की पशुधन अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण, किंतु अभी तक अपेक्षाकृत कम उपयोग किया गया क्षेत्र है । उन्होंने कहा कि बकरी, भेड़, गदही एवं ऊँट का दूध पोषण सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका तथा पशुपालकों की आय में विविधता लाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है । उन्होंने गैर-बोवाइन दूध से संबंधित नवीन तकनीकों एवं उत्पादों को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए अनुसंधान एवं उद्योग के बीच मजबूत सहभागिता की आवश्यकता पर बल दिया । निदेशक ने कहा कि बकरी का दूध छोटे एवं सीमांत पशुपालकों की आजीविका को सुदृढ़ करने की व्यापक क्षमता रखता है, क्योंकि बकरियाँ विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में अनुकूलन की क्षमता रखती हैं और ग्रामीण परिवारों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं ।
मुख्य अतिथि मेजर जनरल (डॉ.) श्रीकांत ने कार्यशाला के आयोजन की सराहना करते हुए पशुधन क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान एवं व्यावहारिक आवश्यकताओं के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया । उन्होंने कहा कि गैर-बोवाइन दूध के क्षेत्र में नवाचार, उद्यमिता एवं उपयुक्त संस्थागत सहयोग के माध्यम से नई संभावनाओं का विकास किया जा सकता है ।
डॉ. ए.के. तोमर, निदेशक, आईसीएआर-सीएसडब्ल्यूआरआई, अविकानगर ने भेड़ पालन के महत्व तथा भेड़ के दूध की उत्पादकता, वैज्ञानिक प्रबंधन एवं उपयोगिता बढ़ाने के लिए अनुसंधान एवं तकनीकी हस्तक्षेप की आवश्यकता पर प्रकाश डाला ।
डॉ. ए.के. पुनिया, निदेशक, राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केन्द्र, बीकानेर ने ऊँट के दूध की विशिष्टताओं एवं संभावनाओं पर चर्चा करते हुए ऊँट के दूध के वैज्ञानिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं बाजार विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई ।
डॉ. शिव कुमार, आईसीएआर-एनआईएपी, नई दिल्ली ने गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र के विकास के लिए उपयुक्त नीतिगत ढाँचे, आर्थिक विश्लेषण, संस्थागत व्यवस्था तथा बाजारोन्मुखी दृष्टिकोण के महत्व पर प्रकाश डाला ।
डॉ. पी.के. कौशिक, उप निदेशक, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली ने पशुधन आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने, आधारभूत संरचना के सुदृढ़ीकरण तथा पशुपालकों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए सरकारी योजनाओं एवं नीतिगत सहयोग की भूमिका पर विचार व्यक्त किए ।
कार्यशाला में विशेषज्ञों द्वारा यह रेखांकित किया गया कि गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र का व्यवस्थित विकास पशुपालकों की अतिरिक्त आय, ग्रामीण रोजगार एवं उद्यमिता, पोषण विविधता तथा पशुधन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हो सकता है ।
कार्यशाला में गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र के सतत विकास के लिए अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों, उद्योगों, उद्यमियों एवं पशुपालकों के बीच समन्वित प्रयास की आवश्यकता पर बल दिया गया। तकनीकी हस्तांतरण, पशुपालक प्रशिक्षण, गुणवत्ता आश्वासन, उत्पाद मानकीकरण, बाजार संपर्क एवं उपभोक्ता जागरूकता को भविष्य की प्राथमिकताओं के रूप में रेखांकित किया गया ।
राष्ट्रीय कार्यशाला ने भारत में बकरी, भेड़, गदही एवं ऊँट के दूध की संभावनाओं, चुनौतियों एवं विकास के अवसरों पर व्यापक विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया तथा गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र को वैज्ञानिक, तकनीकी एवं बाजारोन्मुख आधार पर विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में अपनी उपयोगिता स्थापित की ।



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