मुख्यमंत्री ने गोरखपुर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं एवं ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि पर ‘सप्त दिवसीय पुण्यतिथि समारोह’
के अन्तर्गत ‘संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान-यज्ञ’ के शुभारम्भ किया

श्रीमद्भागवत महापुराण जैसी कथाएं व्यक्ति को केवल आध्यात्मिक दृष्टि नहीं देतीं, बल्कि उसे अपने जीवन, कर्म, विचार और आचरण पर भी विचार करने की प्रेरणा देती : मुख्यमंत्री

गोरक्षपीठ की परम्परा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं, बल्कि
अपनी सनातन ऋषि परम्परा, ज्ञान, भक्ति, संस्कृति, जीवन मूल्यों
और विरासत से समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम

इन पावन कथाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को अपने धर्म, संस्कृति,
परम्परा, मान बिंदुओं और विरासत को समझने का अवसर प्राप्त होता

भौतिक प्रगति के साथ जीवन में स्थायी शांति के सन्दर्भ में
भारत की आध्यात्मिक और ज्ञान परम्परा की प्रासंगिकता सामने आती

सनातन ज्ञान परम्परा व्यक्ति को विवेक, सत्य की पहचान
और जीवन की वास्तविकता को समझने का मार्ग दिखाती

श्रीमद्भागवत महापुराण की पावन कथा श्रद्धालुओं को ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म, आत्मचिंतन और जीवन के उद्देश्य को समझने की प्रेरणा प्रदान करेगी

जीवन में स्थायी सुख और शांति की जो परिकल्पना, उसके मार्ग को समझने
के लिए भारत की भूमि और उसकी सनातन परम्परा महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती


लखनऊ : 23 सितम्बर, 2026 : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि आज विश्व मानवता अनेक चुनौतियों से जूझ रही है। विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है। जीवन के साधन बढ़े हैं, तकनीक ने पूरी दुनिया को जोड़ दिया है, लेकिन इसके बावजूद मानव जीवन के सामने यह प्रश्न बना हुआ है कि स्थायी सुख और शांति कैसे प्राप्त हो। भौतिक प्रगति के साथ जीवन में स्थायी शांति की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी सन्दर्भ में भारत की आध्यात्मिक और ज्ञान परम्परा की प्रासंगिकता सामने आती है।
मुख्यमंत्री जी आज श्री गोरखनाथ मंदिर, गोरखपुर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित ‘सप्त दिवसीय पुण्यतिथि समारोह’ के अंतर्गत ‘संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान-यज्ञ’ के शुभारम्भ अवसर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि जीवन में स्थायी सुख और शांति की जो परिकल्पना है, उसके मार्ग को समझने के लिए भारत की भूमि और उसकी सनातन परम्परा महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। भारत में कथा की पावन परम्परा व्यक्ति को जीवन के मूल प्रश्नों से जोड़ती है और उसके मार्ग को सरल एवं सुगम बनाती है। श्रीमद्भागवत महापुराण जैसी कथाएं व्यक्ति को केवल आध्यात्मिक दृष्टि नहीं देतीं, बल्कि उसे अपने जीवन, कर्म, विचार और आचरण पर भी विचार करने की प्रेरणा देती हैं।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि गोरक्षपीठ की परम्परा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं, बल्कि अपनी सनातन ऋषि परम्परा, ज्ञान, भक्ति, संस्कृति, जीवन मूल्यों और विरासत से समाज को जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसी क्रम में प्रतिवर्ष पूज्य आचार्य युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज एवं पूज्य महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पावन पुण्यतिथि के अवसर पर गोरक्षपीठ में विभिन्न साप्ताहिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उन्होंने पूज्य आचार्यों की पावन स्मृतियों को नमन करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।
गोरक्षपीठ में वर्ष में दो-तीन बार आयोजित होने वाली इन पावन कथाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को अपने धर्म, संस्कृति, परम्परा, मान बिंदुओं और विरासत को समझने का अवसर प्राप्त होता है। यह परम्परा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने और सनातन जीवन मूल्यों की समझ विकसित करने का भी माध्यम है। आज उसी पावन परम्परा के वाचन के लिए जगतगुरु मूलक पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी राजेंद्र देवाचार्य जी महाराज का गोरक्षपीठ में आगमन हुआ है। उन्होंने पवित्र व्यास पीठ पर विराजमान स्वामी राजेंद्र देवाचार्य जी महाराज का अभिनन्दन एवं स्वागत किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज से आगामी 29 सितम्बर तक अपरान्हकालीन सत्र में श्रीमद्भागवत महापुराण की पावन कथा का आयोजन होगा। इस कथा का 07 दिनों तक निरन्तर श्रवण करने का सौभाग्य गोरखपुर सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश के श्रद्धालुओं को प्राप्त होगा। प्रातःकालीन सत्र में भारत की सनातन परम्परा से जुड़े महत्वपूर्ण एवं ज्वलंत विषयों पर विद्वत समाज द्वारा गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। इस प्रकार साप्ताहिक पुण्यतिथि कार्यक्रम आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ समाज और राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श का भी माध्यम बनता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा अत्यन्त प्राचीन परम्परा है। लगभग 5,000 वर्षों से भारत का श्रद्धालु समाज इस पावन कथा का श्रवण करता आ रहा है। यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्ति, भक्ति की अनुभूति, निष्काम कर्म की प्रेरणा लेते हुए जीवन के गूढ़ रहस्यों और उसके वास्तविक उद्देश्य को समझने का माध्यम है।
हमें स्मरण करना चाहिए कि लगभग 5,000 वर्ष पूर्व शुकदेव जी महाराज ने राजा परीक्षित को इस पावन कथा का श्रवण कराया था। उस समय से लेकर आज तक एक लम्बा कालखण्ड बीत चुका है। इस दौरान अनेक युग आए और बीते, सनातन धर्म ने सम एवं विषम परिस्थितियों का सामना किया। अनेक विपरीत परिस्थितियों से गुजरने तथा उत्थान और पतन का क्रम भी चलता रहा। इसके बावजूद भारत की सामूहिक स्मृति में उसकी पावन ऋषि परम्परा और उससे जुड़ी कथा परम्परा निरन्तर सुस्पष्ट है। इस परम्परा को भारत की स्मृति से कोई मिटा नहीं सका।
आज भी जब श्रीमद्भागवत महापुराण जैसी पावन कथा का आयोजन होता है, तो हजारों-हजार श्रद्धालु उसमें सहभागी बनते हैं। श्रद्धालु कथा के माध्यम से जीवन की वास्तविकता को समझने, जीवन के उद्देश्य को जानने और अज्ञानता से मुक्ति का मार्ग खोजने का प्रयास करते हैं। कथा व्यक्ति को अपने जीवन को देखने, उसके उद्देश्य को समझने और अपने आचरण को सही दिशा देने की प्रेरणा प्रदान करती है।
इस वर्ष श्रद्धालुओं का विशेष सौभाग्य है कि वृन्दावन धाम से पधारे परम वीतरागी संत एवं अपने जीवन में उसी अनुरूप आचरण करने वाले जगतगुरु मूलक पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी राजेंद्र देवाचार्य जी महाराज के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत महापुराण की पावन कथा का श्रवण करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। संत का जीवन स्वयं उसके संदेश का प्रमाण होता है। जब विचार, वाणी तथा आचरण में एकरूपता होती है तो उसका प्रभाव समाज पर पड़ता है।
व्यक्ति अपने जीवन में जैसा आचरण करता है, उसके विचार भी यदि उसी के अनुरूप हों तो उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है। मनसा, वाचा और कर्मणा जब व्यक्ति एक ही दिशा में चलता है तो उसके जीवन में सफलता और सार्थकता आती है। इसके विपरीत जब व्यक्ति बोलता कुछ है, करता कुछ और है तथा मन में कुछ और रखता है, तो उसके भीतर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। ऐसी स्थिति व्यक्ति को न घर की रखती है और न घाट की। जीवन के अज्ञान और भ्रम का एक मूल कारण विचार, वाणी और कर्म के बीच यह असामंजस्य भी है।
सामान्य जीवन में भी हमारे सामने यह चुनौती रहती है कि सत्य क्या है और असत्य क्या है, इसकी पहचान कैसे की जाए। आज के समय में सोशल मीडिया मंचों ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। सत्य और असत्य के बीच अर्धसत्य की एक नई स्थिति सामने आई है। अर्धसत्य पूर्ण सत्य नहीं होता, लेकिन वह व्यक्ति के सामने भ्रम की स्थिति अवश्य पैदा कर सकता है। ऐसे समय में सनातन ज्ञान परम्परा व्यक्ति को विवेक, सत्य की पहचान और जीवन की वास्तविकता को समझने का मार्ग दिखाती है।
मुख्यमंत्री जी ने विश्वास व्यक्त किया कि श्रीमद्भागवत महापुराण की पावन कथा श्रद्धालुओं को ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म, आत्मचिंतन और जीवन के उद्देश्य को समझने की प्रेरणा प्रदान करेगी।
इस अवसर पर जगतगुरु मूलक पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी राजेंद्र देवाचार्य जी महाराज, सहित अन्य संतजन तथा श्रद्धालुजन उपस्थित थे।

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