गाल बजाता विपक्ष - अनुज अग्रवाल
देश की राजनीति में विचित्र तरह की हलचल है। समूचा विपक्ष मानो मोदी सरकार के तख्तापलट को तैयार बैठा हो। लेकिन विपक्षी एकता के सूत्रधार नीतीश कुमार को जीतनराम् माँझी तो शरद पवार को उनके भतीजे अजीत पवार ने जी तरह बीच मझधार में छोड़ एनडीए का दामन थामा उससे इनके नेतृत्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए।लोकसभा चुनाव पास आते देख यह हलचल होना स्वाभाविक भी है। लगातार दो बार मात खाया विपक्ष किसी भी कीमत पर सत्ता वापसी के लिए संघर्ष करता दिख भी रहा है मानो यह आर पार की लड़ाई हो। तो एनडीए भी हर क़ीमत पर तीसरी बार सत्ता में आने के लिए ताल ठोंक रहा है।हाल ही में पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर जुटे 16 -17 विपक्षी दलों ने अनेक आपसी मतभेद और सत्ता संघर्ष के बीच भी एकजुटता दिखाने की कोशिश भी की चिंता कांग्रेस पार्टी के तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से गहरे मतभेद सामने आ ही गए। सैद्धांतिक रूप से साथ लड़ने की कसमें खाने के बाद अब जुलाई में बैंगलोर में कांग्रेस पार्टी की पहल और नेतृत्व में विपक्षी जुटान होगा। बहुत सारे विपक्षी दल नीतीश कुमार की इस पहल से दूर रहे तो उधर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एनडीए अपने विस्तार की तैयारी में जुटा दिख रहा है। कुल जमा अभी विपक्ष औपचारिक गठजोड़, न्यूनतम साझा कार्यक्रम और नेतृत्व इन सभी मुद्दों पर आत्ममंथन और चिंतन कर रहा है। हाँ यह स्पष्ट दिख रहा है कि वे सब भाजपा के प्रखर राष्ट्रवाद और बहुसंख्यकवाद की राजनीति से घबराए हुए हैं किंतु इसकी कोई काट या तोड़ उनके पास दिखाई नहीं दी और वे सेकुलरवाद व तुष्टिकरण के नारे पर ही टिके हुए हैं।
विपक्ष का अनेक दलों में बँटा रहना, आपस में विलय कर एक दल न बना पाना, एक सर्वमान्य नेतृत्व न ढूँढ पाना तो उनकी असफलता के सर्वमान्य लक्षण हैं जिन पर सार्वजनिक रूप से खांसी बहस हो चुकी है किंतु विपक्ष का उससे भी बड़ा संकट है बदलते समय और परिस्थितियों से तालमेल न बैठा पाना। विपक्षी दल पिछले नौ सालो में देश में हुए विकास व केंद्र सरकार की प्रत्येक पहल में व्यापक जन सहभागिता को समझ ही नहीं पा रहा। हमेशा नकारात्मक व आलोचनात्मक रहना , देश विदेश में भारत की छवि बिगाड़ने की कोशिश करना , देश में अल्पसंख्यकवाद व भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना, बिना राष्ट्र हित को ध्यान में रखकर तुरंत लाभ के लिए गलत नीतियों को अपने शासित राज्यों में लागू करना, राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के मुद्दों का मौखल उड़ाना आदि आदि। विपक्ष समझ नहीं पा रहा है कि अब देश में अल्पसंख्यकवाद और सेकुलर पंथी “बाँटो और राज करो” की राजनीति सिकुड़ रही है और राष्ट्रवाद, विकास की राजनीति बहुसंख्यकवाद व नरम हिंदुत्व तेजी से जगह बना चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका पर्याय बन चुके हैं। विपक्ष ने पिछले नौ सालो में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, जीएसटी, नोटबंदी, किसानों व पेंशन जैसे अनेक मुद्दों पर भ्रमित करने वाला जमीनी संघर्ष किया किंतु जनता ने अंतत: मोदी सरकार का साथ दिया। जनता बदलाव चाहती है और इसलिए वह हर रोज़ नई पहल करने वाले नरेंद्र मोदी के साथ खड़ी हुई है। युवाओं के देश भारत की जनता अनेक विसंगतियों व चुनौतियों के बाद भी हमेशा सकारात्मकता व हर कीमत पर आगे बढ़ते रहने को तैयार रहती है , इसलिए उसने कोविड जैसे महामारी को भी झेलकर देश की अर्थव्यवस्था को पुन: पूर्व की स्थिति में खड़ा कर दिया है। आज पूरी दुनिया में भारत को वैश्विक नेता के रूप में देखा जा रहा है। हाल के अमेरिकी दौरे में प्रधानमंत्री मोदी एक “ महानायक” बनकर उभरे हैं।जो सम्मान, समर्थन और महत्व उनको मिला वह अविस्मरणीय है। अमेरीका की राजकीय यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री का व्हाइट हाउस में जैसा भव्य स्वागत हुआ और अमेरिकी संसद में उनके संबोधन को जिस तरह सराहा गया, उससे यदि कुछ स्पष्ट हो रहा है तो यही कि दोनों देशों के संबंध एक नए युग में पहुंच रहे हैं। वैसे तो दोनों देशों के संबंध एक लंबे समय से प्रगाढ़ हो रहे हैं, लेकिन इसके पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री को अमेरीका में शायद ही इतनी महत्ता मिली हो।
लेकिन भारत का विपक्ष इस बड़ी उपलब्धि पर देश के साथ खड़ा नहीं दिखता । अमेरीका एवं भारत के बीच बढ़ती प्रगाढ़ता से चीन पर भारत की निर्भरता न्यूनतम हो जायेगी। चीन की दादागिरी उसके लिये कितनी नुकसानदेय साबित हो रही है कि एक बड़ा बाजार चीन के हाथ से निकल रहा है। अगर विपक्ष को देश की मुख्यधारा की राजनीति में रहना है तो उसको भी अपना दृष्टिकोण , चिंतन, कार्योजना व शैली सब बदलने होंगे। इसके साथ ही आपसी विलय कर एक दल के रूप में सामने आना होगा और मोदी जी के समकक्ष उतना ही योग्य प्रतिद्वंदी खड़ा करना होगा अन्यथा उनकी सारी रेस अपने अस्तित्व को जैसे तैसे बचाने की रह जाएगी , देश की सत्ता में तो वे आने से रहे।
निश्चित रूप से अनेक राज्यों में विपक्ष भाजपा को कड़ी टक्कर दे रहा है और विपक्ष के पास अनेक क्षेत्रीय कद्दावर नेता हैं जिनकी अपने अपने प्रदेश में व्यापक लोकप्रियता और विश्वसनीयता है किंतु कोई एक भी राष्ट्रीय स्तर की सोच और व्यक्तित्व वाला नहीं है। इसी कारण आज की केंद्र की राजनीति की दिशा और मुद्दे भाजपा ही तय करती है और विपक्ष उसका मात्र पीछा करता दिखता है। कश्मीर से धारा 370 कि हटाना हो, राम मंदिर का निर्माण हो या अब समान नागरिक संहिता को लागू करने की बात , भाजपा अपने मूल एजेंडे से कभी नहीं भटकी। अब शीघ्र पाक अधिकृत कश्मीर पर भी कब्जे की हुंकार देश के रक्षा मंत्री कर रहे हैं तो नए पेंशन बिल को भी लाने की तैयारी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पिछले कुछ समय में अपनी सरकार के नौ साल पूरे होने पर सैकड़ों रैली कर चुका है, हज़ारो योजनाएं पूरी कर लागू की जा रही हैं और विपक्ष बस एकता के नाम पर गाल बजा रहा है।
अनुज अग्रवाल
संपादक, डायलॉग इंडिया
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