उतरौला बलरामपुर - रमजान का पहला अशरा मुकम्मल हो रहा है, और ग्यारहवें रोजे से दूसरे अशरे का आगाज हो रहा है। रमजान में कुल तीन अशरे होते हैं, पहला अशरा रहमत यानी (दया)का, दूसरा अशरा मगफिरत यानी (माफी) का, और तीसरा अशरा जहन्नम से आजादी का। सुन्नी जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना अख्तर रजा ने बताया कि रमजान के ये तीनों अशरे मिलकर इसे रूहानी और पवित्र बनाते हैं। इसमें इबादत रोजा और कुरआन की तिलावत का सवाबकई गुना बढ़ जाता है। अल्लाह की विशेष दया और बरकतें बन्दों पर नाजिल होती हैंआखिरी अशरे में लैलतुल कद्र (हजार महीनों से बेहतर की रात) आती है, जिस रात को जागकर मोमिन अल्लाह की इबादत करते हैं। इसी अशरे में मस्जिदों में एतिकाफ बैठते हैं।
मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रमजान के पहले अशरे को रहमत, दूसरे अशरे को मगफिरत और तीसरे अशरे को नरक से मुक्ति पाने वाला मही ना बताया है। इन दिनों अधिक से अधिक इबा दत,कुरआन की तिला वत और गरीबों की मदद करनी चाहिए।
*एत्तेकाफ क्या है*
एत्तेकाफ इस्लाम धर्म की एक आध्यात्मिक साधना है। जिसमे हर  व्यक्ति रमजान के अन्तिम दस दिनों में 20 रमजान की शाम चांद दिखने तक के लिए खुद को मस्जिद में एकांतवास बैठने के लिए (अलग) कर लेता है, इसका उद्देश्य सांसा रिक कार्यों से दूररहकर अल्लाह की इबादत करना है, कुरान की तिलावत करना एंव शब-ए-कद्र की तलाश मे सम्पूर्ण समय व्यय तीत करना है,*इसका महत्व क्या है* इसे रूहानी (आध्यात्मिक) सुकून और अल्लाह के करीब आने का एक पवित्र जरिया माना जाता है।

             हिन्दी संवाद न्यूज से
            असगर अली की खबर
             उतरौला बलरामपुर। 

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