औरैया // कद्दू वर्गीय फसलों में आने वाली प्रमुख बीमारियों एवं कीटों की रोकथाम हेतु जनपद के गुवारी, गांव विकासखण्ड-अछल्दा में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के पौध संरक्षण विशेषज्ञ अंकुर झा ने बताया कि किसान भाई अपनी कद्दू वर्गीय फसलों में बीमारियों एवं कीटों की रोकथाम हेतु निम्नलिखित उपाय करें जिससे कद्दू वर्गीय फसलों में बीमारियों एवं कीटों का प्रकोप न होने पाए- 
1 - चूर्णिल आसिता- आसिता का आक्रमण होने पर बेलों, पत्तियों और तनों पर सफेद पर्ते चढ़ जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिये कैराथिन नामक दवा को एक ग्राम/ली. पानी में या बेविस्टीन 2 ग्राम/ली. पानी में घोलकर 10-12 दिनों के अन्तराल पर शायंकाल के समय छिड़काव करें।
2 - मृदुल आसिता- इस बीमारी में पत्तियों की निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं यदि गर्मियों के मौसम में बरसात हो जाए तो यह बीमारी बहुत अधिक फैलती है। इसकी रोकथाम हेतु डायथेन एम.-45 अथवा रिडोमिल नामक दवा को 2.0 ग्राम/ली. पानी में घोलकर शायंकाल के समय छिड़काव करें।

3 - मोजैक- यह विषाणु द्वारा होता है इस बीमारी से ग्रसित पौधे की पत्तियों पर पीले रंग की धारियाँ या धब्बे बन जाते हैं एवं पत्तियाँ छोटी रह जाती हैं और सिकुड़ने लगती हैं तथा इस रोग का फैलाव रस चूसने वाले कीटों द्वारा होता है। इस रोग की रोकथाम के लिए रोगग्रस्त पौधों की पहचान कर शीघ्रता से उखाडकर गडडे में दबा देना चाहिए। वायरस के संवाहक सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरप्रिड नामक दवा को 17.8 एस.एल. 1 मिली./ली. का शायंकाल के समय छिड़काव करें एवं पीले व नीले रंग के स्टिकी ट्रैप (चिपकने वाला यंत्र) 10-12 ट्रैप/एकड़ की दर से प्रयोग करें।

4 - एन्थ्रेक्नोज- इस बीमारी में हल्के भूरे धब्बे पत्तियों में आते हैं जो कि बाद में हरे भूरे रंग में परिवर्तित होकर पूरे पौधों में फैल जाते हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए डायथेन एम 45 नामक दवा अथवा बेबिस्टीन नामक दवा को 2.0 ग्राम/ली. पानी में घोल बनाकर शायंकाल के समय छिड़काव करें।

5 - लाल कद्दू भ्रंग- इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों ही फसल को हानि पहुँचाते हैं। वयस्क कीट पौधों के पत्तों में टेढ़े-मेढ़े छेद करते हैं जबकि शिशु पौधों की जड़ों, भूमिगत तने व भूमि से सटे फलों तथा पत्तों को नुकसान पहुँचाते हैं। इनके नियंत्रण हेतु एमामेक्टिन बैंजोएट नामक दवा को 5 एस.जी.-10 ग्राम/15 ली. पानी या इन्डोक्साकार्ब 14.5 एस.सी.-1 मि.ली./2 ली. पानी का शायंकाल के समय छिड़काव करें।

6 - फल मक्खी- इस कीट की मक्खी फलों में अंडे देती है तथा शिशु अंडे से निकलने के तुरंत बाद फल के गूदे को भीतर ही भीतर खाकर सुरंग बना लेते हैं। इसके नियंत्रण हेतु स्पाइनोसेड 45 एस. सी. नामक दवा की 2 मिली./10 ली. पानी की दर से शायंकाल के समय छिड़काव करें एवं फल मक्खी की रोगथाम हेतु प्रपंच यंत्र (फेरोमेन ट्रैप) 12-15 प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें।

7 - सफेद मक्खी एवं चेपा-  इस कीट के शिशुओं व वयस्कों के रस चूसने से पत्ते पीले पड़ जाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए कद्दू वर्गीय फसलों की प्रमुख बीमारियों एवं कीटों की प्रबंधन विधियों को कैसे अपनाए। या डाइमेथोएट 30 ई.सी. 2 मिली./ली. पानी की दर से शायंकाल के समय छिड़काव करें।

अन्त में संरक्षण विशेषज्ञ अंकुर झा ने बताया किसी भी जानकारी के लिए किसान भाई सीधे जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र पर भी सम्पर्क कर सकते है। 

ब्यूरो रिपोर्ट - जितेन्द्र कुमार 

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